माघ मेले अगर अपनों से बिछड़े तो भूले भटके शिविर में जाकर करें बस ये काम, चंद मिनटों आपके चेहरे पर खिल उठेगी मुस्कान

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Edited By Amrit Vichar
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माघ मेले में 1946 से अब तक 15.32 लाख बिछड़ों को परिवारों से मिला चुका है भूले भटके शिविर

प्रयागराज, अमृत विचार। कलुवा मेले में जहां कहीं हो भूले भटके शिविर में आ जाएं ....... इस तरह की आवाज पूरे माघ मेले में गूंज रही है। मेले में आने वाले स्नानार्थियों के परिवार से बिछड़ जाने के बाद उन्हें उनके परिवार से मिलाने के लिए यह आवाज भूले भटके शिविर से लगाई जा रही है। पिछले 35 वर्षो से ऐसी ही आवाज हर वर्ष माघ मेले में गूंजती है और बिछड़े परिवार को मिलाने का कार्य करती है। निःशुल्क और सेवा भाव से यह कार्य स्वर्गीय राजा राम तिवारी के पुत्र उमेश तिवारी कर रहे है। 

माघ मेला मकर संक्रांति के पहले स्नान से शुरू हो चुका है। ऐसे में 'भूले भटके शिविर', जो कि 53 दिनों तक चलने वाले धार्मिक मेले में निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहा है। इस शिविर को स्वर्गीय राजा राम तिवारी के पुत्र आयोजक उमेश तिवारी संभाल रहे है। माघ मेला हो या कुंभ यह शिविर मेले का एक अभिन्न अंग बन चुका है।  

माघ मेला में देश के कई राज्यों से लाखों करोड़ों भक्त यहां गंगा स्नान और दान पुण्य करने आते है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपना रास्ता भूल जाते हैं। बता दें कि यह शिविर ने 1946 में शुरु किया गया था। शिविर की शुरुआत 1946 में अस्सी वर्षीय राजा राम तिवारी ने की थी। 

तब से, भूले भटके शिविर मेले का एक अभिन्न अंग बन गए। इसने महाकुंभ, अर्ध कुंभ और 55 से अधिक माघ मेलों के दौरान 21,853 बच्चों सहित 15.32 लाख लोगों को उनके परिवारों से मिलाया है। अमृत विचार से खास बातचीत में शिविर के आयोजक उमेश तिवारी ने आपनी बातों को साझा किया। 


मेला परिसर में 50 सक्रिय सदस्य होंगे

मेले में खोए हुए लोगों की मदद के लिए मेला परिसर में 50 सक्रिय स्वयंसेवकों को कंप्यूटर लगाया जा रहा हैं। शिविर त्रिवेणी रोड पर लगाया गया है।  इस बार लोगों को उनके परिवारों से मिलाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा भी लिया जाएगा।'इस साल स्वयंसेवक लापता व्यक्तियों के नाम, पते और तस्वीरों सहित डेटा भी एकत्र करने में लगे है। 

पहले मैनुअल होता था काम

पहले काम मैन्युअल रूप से किया जाता था, और डेटा संकलित करना कठिन था। एक बार जब स्वयंसेवक लापता व्यक्तियों की तस्वीरें और अन्य विवरण लेने में सक्षम हो जाएंगे, तो वे परिवारों का पता लगाने के लिए शहर और पड़ोसी जिलों की पुलिस से भी मदद ले सकेंगे।

पहली बार, खोया-पाया शिविर में हाइटेक व्यवस्था

शिविर के स्वयंसेवकों के लिए इस बार हाइटेक व्यवस्था की जा रही है। वेब-कैमरा और इंटरनेट सेवाओं के साथ कंप्यूटर सेट लगाए जा रहे है।  ताकि वे पुलिस अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में जुड़े रहे। इससे लापता व्यक्तियों को उनके परिजनों से मिलवाने में उन्हे सहूलियत होगी। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और अन्य राज्यों सहित विभिन्न राज्यों के स्वयंसेवक इस उद्देश्य का हिस्सा बनने के लिए संगठन में शामिल हैं।

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