बरेली: विवादित ढांचा विध्वंस प्रकरण पर फैसला आते ही खुशी से झूमे रामभक्त

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। 6 दिसंबर 1992 को रामजन्मभूमि परिसर स्थित विवादित ढांचे के विध्वंस प्रकरण का बुधवार को फैसला आते ही रामभक्त खुशी से झूम उठे। लोगों की निगाहें टीवी,सोशल मीडिया पर लगी थीं। क्या फैसला आएगा, यह सोचकर हर किसी की धड़कनें तेज हो रही थीं। कुछ जगहों पर फैसला आने से पहले पूजा …

बरेली, अमृत विचार। 6 दिसंबर 1992 को रामजन्मभूमि परिसर स्थित विवादित ढांचे के विध्वंस प्रकरण का बुधवार को फैसला आते ही रामभक्त खुशी से झूम उठे। लोगों की निगाहें टीवी,सोशल मीडिया पर लगी थीं। क्या फैसला आएगा, यह सोचकर हर किसी की धड़कनें तेज हो रही थीं। कुछ जगहों पर फैसला आने से पहले पूजा की गई।

राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन से जुड़े कार सेवकों के मन में उस समय की घटानाएं जीवंत हो गई। विविदित ढांचा गिरने, अशोक सिंघल का सिर फटने से खून बहना, मंच से हुंकार और ढांचा गिरते ही धुंध का गुबार, तेज आवाज, जेल के दिन, कई मील पैदल चलना यह सब बातें याद कर इस आंदोलन से जुड़े लोग भावुक हो गए।

सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं
सरस्वती शिशु मंदिर के आचार्य दिनेश अवस्थी फैसला आते ही बोल पड़े कि सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं। राम मंदिर आंदोलन से गहरा जुड़ाव होने के कारण बुधवार की सुबह से ही उनके घर में पूजा अर्चना की जा रही थी। फैसला आते ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी बातों को याद करते हुए बोले कि हमें याद है कि दो बार अयोध्या में कार सेवक के रूप में गए थे। एक बार तो रेल लाइन की पटरी के सहारे कार सेवक के साथ 350 किमी की पैदल यात्रा कर राम जन्मभूमि पहुंचे थे। अपनी आंखों के सामने विवादित ढांचे को गिरते हुए देखा था। उन्होंने बताया कि तब इस कदर जुनून था कि चार वर्ष तक दाढ़ी नहीं बनवाई। दो मित्रों के साथ 28 नवंबर 1992 को अयोध्या पहुंचे थे। 7 दिसंबर तक वह कारसेवक पुरम में रुके थे। कोर्ट का फैसला न्यायोचित है, इसका सभी को सम्मान करना चाहिए।

सच्चाई की जीत के साथ एक बार फिर ताजा हो गई यादें
भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य राकेश मोहन त्यागी ने बताया कि राममंदिर आंदोलन से गहरा जुड़ाव रहा है। कोर्ट के फैसले से साबित हो गया है कि सच्चाई को कभी हार का सामना नहीं करना पड़ता है। इस फैसले से हम बहुत खुश हैं। हमें याद है कि अयोध्या में कार सेवा के लिए एक माह पहले ही चला गया था। पहली कार सेवा 1990 में हुई थी। पैदल-पैदल खेत व पगडंडी के रास्ते अयोध्या पहुंचे थे। 30 अक्टूबर को रातभर गांव के रास्ते चले। 2 नवम्बर को पुलिस की लाठियों, आंसू गैस से बचने के लिए लालकोठी में छिप गए। उमा भारती सिर मुड़वाकर आईं थीं। वो काफी संघर्ष भरे दिन थे। अध्योया के विशारतगंज की सभा में अशोक सिंघल, स्वामी वासुदेवानंद, उमा भारती, साध्वी ऋ तंभरा के भाषण अभी भी जेहन में कौंधते हैं। जब फैसला आया तो आंखें खुशी से डबडबा गईं।

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