तलाक की डिक्री बिना विवाह विच्छेद मान्य नहीं :हाई कोर्ट 

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन के भुगतान संबंधी एक मामले पर विचार करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों द्वारा शासित विवाह का विच्छेद उक्त अधिनियम के प्रावधानों द्वारा ही हो सकता है। उक्त अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सक्षम न्यायालय द्वारा तलाक की डिग्री प्राप्त होने के बाद ही विवाह भंग माना जाता है। अगर किसी मामले में ऐसी डिक्री प्राप्त नहीं हुई है तो विवाह भंग नहीं माना जाएगा और पति या पत्नी अगर सरकारी कर्मचारी है तो पारिवारिक पेंशन का हकदार कानूनी विवाहित साथी को ही माना जाएगा। 

वर्तमान मामले में भोजराज सिंह सरकारी कर्मचारी के रूप में महाराजा तेज सिंह जूनियर हाई स्कूल, आरंग विकासखंड, सुलतानगंज मैनपुरी में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। 30 जून 2012 में सेवानिवृत होने के बाद वर्ष 2021 में उनकी मृत्यु हो गई। अपीलकर्ता पारिवारिक पेंशन के भुगतान की मांग इस आधार पर कर रही है कि पिछले कई वर्षों से वह स्वर्गीय भोजराज सिंह की विवाहिता के रूप में उनके साथ रह रही है। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि हालांकि भोजराज सिंह ने पहले निजी प्रतिवादी उषा देवी के साथ विवाह किया था, लेकिन अंततः दोनों पक्ष अलग हो गए। इस संबंध में उषा देवी द्वारा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कार्यवाही भी शुरू की गई थी, जिसमें एक समझौता करने के बाद विवाह टूट गया। 

एक बार जब उषा देवी मृत कर्मचारी से अलग हो गई तो उनके पास पारिवारिक पेंशन का दवा करने का अधिकार नहीं है, लेकिन इस संबंध में विचार करने पर कोर्ट ने पाया कि पक्षकारों के बीच कथित समझौते के आधार पर विवाह भंग नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उनके बीच विवाह अधिनियम के प्रावधानों द्वारा संपन्न हुआ था‌। अतः तलाक की डिक्री के बिना उनका विवाह भंग नहीं माना जाएगा। इसके अलावा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कार्यवाही भरण पोषण से संबंधित है। इस कार्यवाही का यह अर्थ नहीं है कि पक्षों के बीच विवाह भंग हो गया है। इस आधार पर न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने रजनी रानी की विशेष अपील को खारिज कर दिया।

ये भी पढ़ें -स्पष्टीकरण न दे पाने की स्थिति में अपराधी को राहत नहीं :हाई कोर्ट

संबंधित समाचार