Kanpur: रमजान में मिट जाता अमीरी-गरीबी का फर्क, मिल-बांटकर खाने का तरीका बताता है रोजे का इफ्तार- मौलाना नुसरत आब्दी
कानपुर, अमृत विचार। अल्लाह ने रोजे इसलिए वाजिब किए, ताकि सभी को भूख का बराबर से एहसास हो। लोग एक दूसरे की मदद करें। रोजे में अमीरी और गरीबी का फर्क मिट जाए। सभी एक साथ बैठकर मिल और बांटकर इफ्तार करें।
इमामे जमाअत मस्जिद आजमअली खां के मौलाना नुसरत आब्दी ने बताया कि अगर सामाजिक दृष्टि से बात करें तो रोजा भूखों की समस्याओं को समझने का एहसास कराता है। इन दिनों ही पता चलता है कि लोग भूखे होते हैं तो वह किस दर्द से गुजरते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा इंसान जिसके पास दौलत खूब हो और वो कभी भूखा न रहा हो, उसे क्या भूख का एहसास होगा।
उसे यह कतई नहीं पता चलेगा कि एक गरीब की भूख क्या होती है। ऐसे में जब इंसान रोजा रखता है तो उसे भूख और प्यास दोनों का एहसास होता है। इसी एहसास की वजह से वो गरीबों की समस्याओं को समझ सकता है। अल्लाह ने रोजे को सभी पर वाजिब किया है, ताकि रोजे की हालत में अमीरी और गरीबी का फर्क मिट जाए।
रमजान के महीने में लोगों के दिलों में हमदर्दी पैदा होती है। लोग एक दूसरे की मदद करते हैं। इमाम सादिक ने बताया कि अल्लाह ने रोजे को इसलिए भी वाजिब किया है, जिसमें धनी और गरीब एक साथ बैठकर इफतार कर सकें। दोनों में भूख का बराबर से एहसास हो। फिर एक दूसरे दर्द समझे और मदद करें। उन्होंने बताया माहे रमजान रहमतों और बरकतों का महीना है।
