Bareilly News: त्रिकोणीय मुकाबलों का दौर अब नहीं...पिछले दो चुनावों में आमने-सामने का रहा मुकाबला

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। मतदाताओं की जानकारी के लिए यह अहम तथ्य हो सकता है कि बरेली और आंवला संसदीय क्षेत्र में त्रिकोणीय मुकाबलों का दौर खत्म हो रहा है।

बरेली में पिछले दो चुनावों में आमने-सामने का मुकाबला रहा है, आंवला में 2014 का चुनाव तो कुछ हद तक त्रिकोणीय था लेकिन 2019 में वहां भी आमने-सामने की लड़ाई पर केंद्रित हो गया। दोनों चुनाव में दोनों सीटों पर तीसरे नंबर के प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे।

पिछले चुनाव में सपा और बसपा ने भाजपा का मुकाबला करने के लिए गठबंधन कर दोनों सीटों पर संयुक्त प्रत्याशी उतारे थे लेकिन फिर भी जीत का अंतर कम होने के बजाय 2014 के चुनाव से और ज्यादा रहा था। 

कांग्रेस के प्रत्याशी दोनों जगह तीसरे नंबर पर रहे थे लेकिन छह-सात प्रतिशत वोटों पर ही सीमित रह गए। बरेली में 2014 के चुनाव में यही दशा तीसरे नंबर के बसपा प्रत्याशी उमेश गौतम की रही थी जिन्हें 10 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा वोट मिले थे। आंवला में जरूर तीसरे नंबर पर रही बसपा प्रत्याशी सुनीता शाक्य भाजपा के विजयी प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप से लगभग आधे वोट लेने में सफल रही थीं।

पिछले दोनों चुनाव के मत प्रतिशत के आंकड़ों ने यह भी स्पष्ट है कि वोट काटने के लिए मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की अहमियत भी खत्म हो रही है। बरेली और आंवला दोनों जगह मतदाताओं ने ऐसे प्रत्याशियों को सिरे से नकार दिया था। लोकसभा चुनाव- 2019 में तो दोनों सीटों पर चौथे नंबर पर नोटा के वोट रहे थे।

बरेली में 2009 में हुआ था कड़ा मुकाबला
लोकसभा चुनाव- 2009 में बरेली में सबसे कड़ा मुकाबला हुआ था और इसमें कांग्रेस के प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन करीब 2.21 लाख वोट पाकर विजयी रहे थे। भाजपा के संतोष गंगवार चुनाव हार गए थे और करीब 2.11 लाख वोट पाकर दूसरे नंबर रहे थे। बसपा प्रत्याशी इस चुनाव में करीब 1.82 लाख वोट पाकर तीसरे और सपा के भगवत सरन गंगवार 73,549 वोट पाकर चौथे नंबर पर रहे थे।

प्रत्याशी नहीं, पार्टी का वोट बैंक
पिछले कई लोकसभा चुनाव ने सांसद या विधायक रहे उन कद्दावर नेताओं का यह मुगालता भी दूर किया कि वोटों पर उनकी पकड़ है। पार्टी बदलकर चुनाव में उतरते ही इन नेताओं के वोटों में इतनी भारी गिरावट आई कि जमानत तक जब्त हो गई। 

आंवला में कुंवर सर्वराज सिंह 2014 का चुनाव सपा के टिकट पर लड़े थे तो उन्हें 2.71 लाख से ज्यादा वोट मिले लेकिन 2019 में कांग्रेस के टिकट पर उतरे तो 62 हजार वोटों पर सिमटकर रह गए। बरेली में 2014 में बसपा के टिकट पर पूरे संसदीय क्षेत्र में एक लाख ही वोट पाने वाले उमेश गौतम 2017 में दिग्गज डॉ. आईएस तोमर को हराकर मेयर निर्वाचित हो गए। सपा के भगवत सरन को 2009 के लोकसभा चुनाव में 73 हजार वोट मिले थे। 2019 में संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे तो 3.98 लाख पर पहुंच गए।

इतिहास के पन्नों से...
बरेली में छह बार वैश्य, सात बार कुर्मी सांसद
बरेली लोकसभा सीट के लिए अब तक 17 चुनाव हो चुके हैं। इनमें एक उपचुनाव भी शामिल है। शुरू के कई चुनावों में इस सीट पर वैश्य प्रत्याशियों का वर्चस्व रहा और कुल मिलाकर छह बार वैश्य सांसद बने। इनमें सतीश चंद्रा तीन बार और बीबी लाल, राममूर्ति और प्रवीण सिंह ऐरन एक-एक बार चुनाव जीते हैं। दो बार की सांसद बेगम आबिदा अहमद और एक बार मिसरयार खां के साथ कुल तीन बार मुस्लिम प्रत्याशी जीते। कुर्मी प्रत्याशी के रूप में अब तक सात बार संतोष गंगवार जीत चुके हैं। ठाकुर बिरादरी के आछू बाबू भी एक बार सांसद रहे हैं।

सबसे कम वोटों से जीते थे मिसरयार खां
सन् 1980 के आम चुनाव में जब कांग्रेस की पूरे देश में प्रचंड लहर थी, उसमें जनता पार्टी एस की ओर से लड़े मिसरयार खां ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस के रामसिंह खन्ना को 1710 वोटों से हराया था। यह बरेली संसदीय सीट के इतिहास में सबसे कम अंतर था। चुनाव जीतने के बाद मिसरयार खां का निधन हो गया था। इस कारण उपचुनाव कराना पड़ा था।

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