एक ऐसी भी है होलिका जहां पान खाकर तापने से दूर हो जाते हैं रोग, कई जिलों से आते हैं लोग
राजेश मिश्रा/ सुबेहा, बाराबंकी। जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी की दूरी पर नगर पंचायत सुबेहा के पास गुलामाबाद गाँव की होली के पीछे एक गूढ़ रहस्य छुपा हुआ है। यहां मिर्गी, हिस्टीरिया एवं दमा जैसे रोगों का इलाज एक टोटके से किया जाता है। यही वजह है कि यहां की होलिका तापने के लिए रायबरेली, सुल्तानपुर, अमेठी, अयोध्या सहित अन्य जिलों से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। ग्रामीण परिवेश और ग्रामीण संस्कृति की आस्था को भले ही रूढ़ि या अंधविश्वास की संज्ञा दी जाय लेकिन आज के वैज्ञानिक युग में भी कुछ ऐसे स्थल या संस्कार शेष हैं जिनके बल पर लोकमानस अपनी दैहिक , दैविक और भौतिक आपदाओं का निदान करता है । इसका ज्वलंत एवं प्रत्यक्ष उदाहरण है गुलामाबाद की होली। यहाँ पान में जड़ी बूटी डाल कर खाने और जलती होलिका तापने से मिर्गी, हिस्टीरिया एवं दमा जैसे रोगों का इलाज किया जाता है।
जनश्रुति के अनुसार कस्बा सुबेहा में एक प्रख्यात फकीर हुआ करते थे नाम था गुलाम हुसैनी। पहुंचे हुए संत फकीर थे। उनको मानने वालों में हिन्दू व मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग थे।ऐसी किविदन्तियां है कि कुम्हार जाति के एक शिष्य की सेवा से प्रसन्न होकर गुलाम हुसैनी ने उसे एक ऐसी जड़ी बूटी का परिचय कराया। जिसे पान में रखकर खाने से कई प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। आज भी उसी कुम्हार वंश के वशंज फाल्गुन पूर्णिमा को पान में दवा देते है। मौजूदा समय में राम नेवल प्रजापति सहित उसी वंश के एक दर्जन लोग दवा खिलाते हैं।
यह दवा होलिका दहन से दो घंटे पहले दी जाती है। दवा खाने के साथ होली तापने वालों का हुजूम शाम से ही उमड़ने लगता है। और यह क्रम मध्य रात्रि तक चलता हैं । होली जलने से दो घंटा पहले से ही पान में जडी़बूटी डाल कर दवा मरीजों को बांटी जाती है। वहीं दवा लेने के बदले एक सीधा जिसमें दाल, चावल, आटा के अतिरिक्त एक भेली गुड़ व सवा रूपया नकद देना होता हैं। होली तापने से पूर्व पान में दी गई दवा खाकर होली का पहला लूक ( लपट ) देखकर अपने गन्तव्य स्थान की ओर चल देना होता हैं। मरीज को मुड़कर दोबारा होली का लूक (लपट) देखना वर्जित हैं। यह विधान केवल मरीजों के लिए हैं। उनके साथ गए तीमारदारों को भी पहला लूक देखना वर्जित हैं।
