कासगंज: जिंदगी से हारकर चुन रहे मौत का रास्ता, मामूली बात पर आए दिन जा रहीं जानें
कासगंज,अमृत विचार: बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं चिंता का विषय बन गई हैं। पिछले कुछ महीनों में हुईं कई आत्महत्याओं की घटनाओं ने झकझोर कर रख दिया है। खुदकुशी की इन घटनाओं को रोकने के लिए जागरूकता की कोई कोशिश नहीं की जा रही।
मतलब साफ है कि यहां लोग जिंदगी के उलटफेर में लडऩे की वजाय जिंदगी के सामने हारकर हथियार डाल रहे हैं और अंतत: मौत का रास्ता चुन रहे हैं।
पिछले 6 महीनों में जिले में आत्महत्याओं की 15 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। पुलिस तफ्तीश में पाया गया है कि इनमें कई लोगों ने सिर्फ परिवार में हुई कलह में मामूली बात पर आत्महत्या कर जान दे दी। आत्महत्या
करने वालों में जिले में तैनात पुलिस के उपनिरीक्षक देवी सिंह भी शामिल हैं।
पुलिस ने जांच के दौरान यह पाया था कि वह कई दिनों से तनाव में थे और मामूली तनाव पर जान दे दी।
इसके अलावा अगस्त से लेकर शायद ही कोई ऐसा महीना गुजरा हो जब आत्महत्या की घटनाएं सामने न आई हों और उनमें मामूली बात पर जान देने की पुष्टि न हुई हो। यहां चिंता का विषय है कि इतनी घटनाओं के बावजूद भी आत्महत्या की घटनाएं आखिर क्यों नहीं रुक पा रहीं।
जागरूकता की है जरूरत
आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए जागरूकता की जरूरत है। सरकारी तंत्र हो या सामाजिक कार्यकर्ता या फिर संगठन। यदि लोगों को जिंदगी में संघर्ष की सीख देते हुए अभियान चलाकर जागरूकता करें तो निश्चित ही ऐसी घटनाओं को रोकने में मदद मिल सकेगी।
जिले की कुछ घटनाएं-
अभी शनिवार की बात है कि के गांव अभय पुर में 28 साल की विवाहिता नीलम में गृह क्लेश के कारण आत्महत्या कर ली थी। इसके अलावा सोरों के गांव ठठेर निवासी मुकेश ने कासगंज कोतवाली के गांव नदरई में आम के पेड़ पर फांसी लगा ली थी। वहीं हाल ही में और भी आत्महत्या की घटना हुईं।
टूटते परिवार भी हैं घटना का कारण
मनोवैज्ञानिक राजेंद्र सिंह बताते हैं कि खुदकुशी के कारणों के पीछे जहां अवसाद है वहीं टूटते और छोटे परिवार भी इसका का कारण है। संयुक्त परिवारों में इस तरह की घटनाएं नहीं होती है। जहां छोटे परिवार होंगे और व्यक्ति को अपनी समस्या या परेशानी किसी के सामने रखने का मौका नहीं मिलेगा वह अकेले ही अकेले खिन्न रहता है और फिर खुदकुशी उसका अंतिम निर्णय होती है। जरूरत है संयुक्त परिवारों की।
घोर निराशा की स्थिति में करते हैं आत्महत्या
-व्यक्ति घोर निराशा की स्थिति में आत्महत्या करता है। जब उसे यह लगने लगता है कि उसकी कोई बात न सुनने को तैयार है और न समझने को तैयार है। परिवार के लोग भी महत्व नहीं देते। ऐसी स्थिति में आत्महत्या का रास्ता लोग चुन लेते हैं।
सोशल मीडिया का भी बेहद प्रभाव है कि अब सोशल मीडिया पर तो दोस्त हैं जिनसे सभी बात शेयर नहीं की जा सकतीं, लेकिन निजी जिंदगी के दोस्त भी अब दूर होते जा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। हर आयुवर्ग के लोग इससे प्रभावित हैं-डा. रानू शर्मा, समाजशास्त्री।
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