बाराबंकी: गलत कैंडिडेट सिलेक्शन और मायावती का डमी प्रत्याशी बना भाजपा की हार का कारण
भारी पड़ा राजरानी का जिला पंचायत अध्यक्षी का गुमान, आयातित नेताओं को तरजीह भी भाजपा को ले डूबी
बाराबंकी, अमृत विचार। जिले में भाजपा प्रत्याशी राजरानी रावत की करारी शिकस्त के बाद से पार्टी के मंत्री, विधायक, नेता और पदाधिकारियों समेत सभी भौचक्के हैं। बीजेपी की प्रियंका रावत ने जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी, तो 2024 में राजरानी रावत ने सबसे बड़ी हार अपने नाम कर ली। जबकि कांग्रेस को संजीवनी मिल गई। भाजपा खेमें में हार के कारणों की समीक्षा शुरू हो गई है। लेकिन, पार्टी पदाधिकारी हार के कारणों को समझ नहीं पा रहे।
ऐसे में हार की समीक्षा रिपोर्ट तैयार करना भी उनके लिये काफी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। हालांकि इतना जरूर साफ है कि हार की जिम्मेदारी कुछ नेताओं तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले दिनों में कइयों पर गाज गिरना तय है। भाजपा प्रत्याशी की हार में अब तक जो वजहें निकलकर सामने आईं, उनमें पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर आयातित नेताओं को तरजीह देने से लेकर गलत कैंडिडेट का सलेक्शन और मायावती का डमी कैंडिडेट प्रमुख हैं।
कैंडिडेट सिलेक्शन
चुनाव की शुरुआत में निवर्तमान सांसद उपेंद्र रावत के वायरल वीडियो कांड के बाद जब राजरानी रावत के नाम का ऐलान भाजपा प्रत्याशी के तौर पर हुआ तभी ऐसा लगा कि भाजपा ने गलत कैंडीडेट का चयन कर लिया हो। जिला संगठन और पुराने कार्यकर्ताओं की राय को दरकिनार करने की बात भी सामने आई। शायद इसीलिये बहुत सारे ऐसे मतदाता जो भाजपा को वोट देते आ रहे थे, उन्होंने घर से निकलना ही ठीक नहीं समझा या फिर गठबंधन के पक्ष में अपना वोट डाल आए। गलत कैंडिडेट सलेक्शन कार्यकर्ताओं को भी पसंद नहीं आया और उन्होंने मनमुताबिक काम नहीं किया।
जिला पंचायत अध्यक्षी का गुमान
नाम न छापने की शर्त पर जिले में भाजपा के एक बड़े नेता ने बताया कि उनकी प्रत्याशी राजरानी रावत पूरे चुनाव में कभी गंभीर नहीं दिखीं। राजरानी रावत ने कई मौकों पर कहा कि सांसद नहीं भी बनूंगी, तब भी जिला पंचायत की अध्यक्षी तो अपने पास ही रहेगी। इसके अलावा प्रत्याशी के पति चुनाव भर पूरी तरह से हावी रहे। प्रत्याशी ने पार्टी के निचले नेताओं से कभी कोई संवाद ही नहीं किया। इसी वजह से पार्टी का छोटा कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ नहीं सका।
पुराने कार्यकर्ताओं को किया नजरअंदाज
पार्टी कार्यकर्ताओं की नकारात्मक प्रतिक्रिया के बावजूद भाजपा अपने प्रत्याशी का सही चयन नहीं कर सकी। पार्टी प्रत्याशी विरोधी भावना का अनुमान नहीं लगा सकी। जिसने पार्टी के खिलाफ गुस्से को और बढ़ा दिया। इतना ही नहीं पुराने कार्यकर्ताओं ने यहा तक आरोप लगाया कि पूरे चुनाव के दौरान उन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा। जिसका नतीजा रहा कि हर विधानसभा में भाजपा को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।
आयातित नेताओं को तरजीह
दूसरे दलों में बड़े पैमाने पर की गई तोड़फोड़ भी भाजपा प्रत्याशी राजरानी रावत को लक्ष्य के आसपास तक नहीं पहुंचा सकी। चुनाव का बिगुल बजते ही सपा से भाजपा में आने वाले नेताओं की फेहरिस्त लंबी होती चली गई। जिला पंचायत सदस्य नेहा आनंद, पूर्व मंत्री स्वर्गीय कमला प्रसाद रावत की पुत्रवधू लवली रावत और पूजा सिंह समेत तमाम दलों के अन्य नेताओं को भाजपा ने बिना कुछ सोचे समझे शामिल कर लिया। यहां तक कि भाजपा ने पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर इन आयातित नेताओं को पार्टी के मंच पर भी प्रमुखता दी। यह बात भी पुराने कार्यकर्ताओं को नागंवार गुजरी।
पुनिया ने समझा सामाजिक समीकरण
इंडिया गबंधन प्रत्याशी तनुज पुनिया के पिता व पूर्व सांसद डॉ पीएल पुनिया ने काफी सतर्क रहते हुए जातिगत समीकरणों को समय रहते समझा। यही वजह रही कि उनके पुत्र ने जमीन पर भाजपा को बेहद कड़ी टक्कर दी। चाहे मुस्लिम मतदाताओं को गठबंधन के पक्ष में एक जुट करना हो या दलित वोटरों को मोड़ना। हर दिशा में गठबंधन के नेताओं ने एकदम सटीक कदम उठाए।
मायावती के कैंडिडेट ने बिगाड़ा खेल
मायावती ने शिव कुमार दोहरे के रूप में बाराबंकी से ऐसा कैंडिटेट उतारा, जिसने सपा-कांग्रेस गठबंधन का नुकसान करने के बजाय, फायदा पहुंचाने का काम किया। बसपा के डमी कैंडीडेट के चलते भाजपा को काफी नुकसान हुआ। इससे दलित वोटों में उम्मीद के मुताबिक बंटवारा नहीं हुआ। भाजपा नेताओं की मानें तो अगर बसपा ने चुनाव में मजबूत प्रत्याशी उतारा होता, तो नतीजे कुछ और हो सकते थे।
युवाओंं की नाराजगी
जिले के युवाओं के बीच सपा और कांग्रेस नेताओं ने लगातार यह बात रखी कि भाजपा सरकार नौकरी नहीं दे पा रही। पेपर लीक हो रहे हैं। पूरे प्रदेश के साथ जिले के युवाओं में भी यह एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। इसी वजह से जमीन पर भारी संख्या में युवा भाजपा से काफी नाराज दिखे। युवाओं की नाराजगी उनके वोटों में दिखी और वह खुलकर तनुज पुनिया का साथ देते नजर आये।
जातियों में बंट गया हिंदू
जिले में अल्पसंख्यक आक्रामकता को कम करने का बीजेपी का असफल प्रयास और सपा-कांग्रेस गठबंधन के पीछे मुस्लिमों का एकजुट होना, जिसने सफलतापूर्वक भाजपा के विरोध में माहौल तैयार कर दिया। जिले के राजनीतिक जानकारों का तो यहां तक कहना है कि भाजपा हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने में भी असफल रही। हिंदू मतदाता जातियों में बंट गए। जिसका एकतरफा फायदा तनुज पुनिया को मिला।
संविधान बदलने की चर्चा पड़ी भारी
पीएम मोदी के 400 पार नारे को जिले में कांग्रेस और सपा नेताओं ने आरक्षण से जोड़ दिया। दावा किया कि भाजपा इतनी ज्यादा सीटें इसलिए चाहती है ताकि वह संविधान बदल सके और आरक्षण खत्म कर सके। जिले में दलितों और ओबीसी के बीच यह बातें काफी तेजी से फैलीं और नतीजा वोटों के रूप में सामने आया। शायद इसीलिये इस बार यहां का दलित भी सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर जाता दिखा।
यह भी पढ़ें:-बहराइच: मस्जिद के सामने सींचपाल की चाकू से गोद कर हत्या, ग्रामीणों ने आरोपी को पकड़कर पुलिस को सौंपा
