प्रयागराज: भाट समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के मामले में सरकार से जवाब तलब
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भाट समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यूओआई (केंद्र सरकार) और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में बताया गया है कि आजादी के 75 साल के बाद भी भाट समुदाय को विमुक्त जनजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
हालांकि वे उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में स्थायी जीवन जी रहे हैं और राज्य की सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण नहीं दिया गया है जबकि वे इसके हकदार हैं। भाट समुदाय को मई 1961 के शासनादेश द्वारा विशेष दर्जा दिया गया था, जिसमें भाट समुदाय को विभिन्न राज्यों में सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जनजातियों के रूप में सूचीबद्ध करने का प्रावधान किया गया था। याचिका में बताया गया है कि जून 2013 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों और आयुक्तों को एक आदेश जारी किया, जिसमें जाति प्रमाण पत्र के लिए पात्र विमुक्त जनजातियों को विमुक्त जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया, जिसमें विमुक्त जनजाति (ख) के तहत क्रम संख्या-07 पर भाट समुदाय को शामिल किया गया।
इस प्रकार केंद्र और राज्य सरकारों ने समय-समय पर विभिन्न जनजातियों का वर्गीकरण किया, लेकिन आज तक विमुक्त जनजातियों में आने वाली भाट जाति को अनुसूचित जनजातियों के अंतर्गत आने के बाद भी एससी/एसटी श्रेणी का लाभ नहीं मिला। याचिका में कहा गया है कि प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण संपूर्ण भाट समुदाय को अपने मौलिक अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 का स्पष्ट उल्लंघन है। अखिल भारतीय भाट समाज एकता और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और यूपी सरकार को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 22 अगस्त को सुनिश्चित की है।
यह भी पढ़ें- कांवड़ यात्रा : कांवड़ियों के आवागमन पर 19 अगस्त तक बदले रहेंगें मार्ग
