प्रयागराज : अपंजीकृत दस्तावेज पर लिखित रूप में दिया गया मौखिक उपहार भारतीय स्टाम्प अधिनियम के अधीन नहीं
अमृत विचार, प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत उपहार विलेख के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए कहा कि अपंजीकृत दस्तावेज पर लिखित रूप में दिया गया मौखिक उपहार भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 47-ए के तहत कार्यवाही के अधीन नहीं हो सकता है। कोर्ट ने आगे बताया कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 47-ए कलेक्टर को अधिनियम के तहत किसी भी उपकरण पर स्टाम्प ड्यूटी में कमी के लिए कार्यवाही शुरू करने का अधिकार देती है।
धारा 47-ए की उपधारा (1) में प्रावधान है कि जहां पंजीकरण अधिनियम,1908 के तहत पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किसी भी उपकरण में यह पाया जाता है कि उल्लिखित बाजार मूल्य स्टाम्प अधिनियम के तहत निर्धारित मूल्य से कम है तो ऐसे दस्तावेज़ को कलेक्टर को भेजा जाएगा। इसके बाद कलेक्टर धारा 47-ए में निर्धारित शर्तों के अनुसार पक्ष द्वारा भुगतान की जाने वाली स्टाम्प ड्यूटी और दंड में कमी का निर्धारण करने के लिए आगे कार्यवाही शुरू करता है। इसके साथ ही अधिनियम की धारा 47-ए केवल तभी लागू हो सकती है, जब कोई भी उपकरण/दस्तावेज पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया जाता है। मौजूदा मामले में आले हसन नाम के एक व्यक्ति ने 22.12.2005 को सरवरी एजुकेशनल सोसाइटी के पक्ष में विवादित भूमि का मौखिक दान किया। इसके बाद भूमि का कब्ज़ा सोसाइटी को सौंप दिया गया।
बाद में सरवरी एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधक के रूप में कार्य करते हुए मोहम्मद असलम ने साहस डिग्री कॉलेज के पक्ष में भूमि का मौखिक दान कर दिया। सभी दान मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार मौखिक थे। एकपक्षीय रिपोर्ट के आधार पर स्टाम्प अधिनियम की धारा 47-ए के तहत कार्यवाही शुरू की गई। जिसके बाद 11,25,000/- रुपए की स्टाम्प ड्यूटी की कमी दर्शाई गई और उक्त राशि का जुर्माना भी लगाया गया। हालांकि याचियों के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उपहारों को लिखित ज्ञापन में केवल 'याददाश्त' के लिए दर्ज किया गया था और उन्हें पंजीकृत करने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उन पर कोई स्टांप शुल्क देय नहीं था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए माना कि मुस्लिम कानून के तहत उपहार की तीन अनिवार्यताएं- उपहार की घोषणा, स्वीकृति और कब्जे की डिलीवरी हैं और अगर कोई मौखिक उपहार उपरोक्त तीनों शर्तों को पूरा करता है, तो वह एक पूर्ण और अपरिवर्तनीय उपहार है। अंत में न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की एकल पीठ ने साहस डिग्री कॉलेज के सचिव नदीम हसन की याचिका को अनुमति देते हुए कहा कि वर्तमान उपहार विलेख एक अपंजीकृत दस्तावेज है, इसलिए स्टाम्प अधिनियम की धारा 47-ए के तहत याचियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती है।
यह भी पढ़ें- पिता के चालीसवें में लाउडस्पीकर लगा रहे बेटे की करंट से मौत
