बरेली: खुद कह रहे हैं बंदर... पकड़ रहे कम, फेंक रहे हैं ज्यादा अफसर
नगर निगम का बंदरमुक्त अभियान फेल, लोग पहले की तरह ही परेशान
बरेली,अमृत विचार। नगर निगम के अफसरों के दावों के मुताबिक शहर के जिन इलाकों को अभियान चलाकर बंदरों से मुक्त किया जा चुका है, वहां बंदरों ने अब भी लोगों का जीना दूभर कर रखा है। आम लोगों के साथ पार्षद भी नगर निगम के अफसरों और ठेकेदार के दावों को सफेद झूठ बता रहे हैं।
नगर निगम के अधिकारियों के मुताबिक 16 दिनों के अभियान में शहर से 15 सौ से ज्यादा बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ा जा चुका है। शहर के अलग-अलग इलाकों से बंदर पकड़ने के लिए जो रोस्टर बनाया गया है, उसके मुताबिक शास्त्रीनगर, राजेंद्रनगर और रामपुर बाग जैसे पॉश इलाकों और कॉलोनियों को बंदरों से मुक्त किया जा चुका है, लेकिन इन इलाकों के लोग ही इस दावे को हवाई बता रहे हैं। वार्ड 49 शास्त्रीनगर के लोगों का कहना है कि बंदर पकड़ने वाले कुछ दिन पहले दोपहर में आकर चार बंदर पकड़ ले गए और पूरे इलाकों से बंदरों से मुक्त बता दिया।
लोगों ने सिंचाई विभाग की कॉलोनी का नजारा भी दिखाया जहां बंदरों के कई झुंड मौजूद थे। विभाग की वर्कशॉप के आसपास और पार्क में बंदर उत्पात मचा रहे थे। पूरे कालोनी के लोग इस समस्या से त्रस्त है। इसी के बगल की कालोनी के कुछ मकानों के छतों पर बंदर कूद रहे थे और लोग दरवाजा बंद कर लिए थे। राजेंद्रनगर और रामपुर बाग भी नगर निगम के रिकॉर्ड में बंदरमुक्त हो चुका है लेकिन सोमवार को इन दोनों पॉश इलाकों में भी बंदरों की अच्छी-खासी भरमार दिखाई दी। कटरा चांद खां, रोडवेज बस अड्डा, नेकपुर समेत कई इलाकों में लोगों ने बताया कि कुछ समय से बंदरों की संख्या कम होने के बजाय और बढ़ गई है।
पॉश कालोनियों में रहते हैं बंदरों के झुंड
सिविल लाइंस की पॉश कॉलोनियों में शुमार आवास-विकास के लोगों ने भी शिकायत की कि बंदरों का आतंक हद से ज्यादा बढ़ गया है। बोले, कॉलोनी के गेट के पास ही ज्यादातर समय बंदरों के झुंड मौजूद रहते हैं जिसकी वजह से पैदल या बाइक पर आने-जाने वाले लोग गेट से गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कई बार बंदर घरों से भी कपड़े या खाने का सामान लेकर भाग जाते हैं। आवास विकास कॉलोनी गांधी उद्यान और लोहिया पार्क के बीच है, इसलिए दोनों पार्कों से बंदर वहां पहुंचते हैं।
सिंचाई कालोनी में बंदरों का आतंक
सिंचाई कॉलोनी निवासी पवन कुमार ने बताया कि हमारी कॉलोनी में काफी संख्या में बंदर हैं और बहुत चालाक भी हो गए हैं। अगर कोई पकड़ने आता है तो छिप जाते हैं। इन्हें पकड़ने का तरीका बदलना चाहिए। बंदरों से लोगों को काफी दिक्कत हो रही है। अक्सर पूरे के पूरे झुंड लोगों पर हमला कर देते हैं। नगर निगम को इसका स्थायी इंतजाम करना चाहिए। पार्ष गौरव सक्सेना कहते हैं कि बंदर पकड़ने वाले ने कुछ दिन पहले उन्हें फोन कर बताया था कि वार्ड में बंदर पकड़ लिए गए हैं। मैंने लोगों से पूछा तो पता चला कि वे सिर्फ चार बंदर पकड़ ले गए है। वार्ड में बंदरों की संख्या सैकड़ों में है। सिंचाई विभाग की कॉलोनी में भी बंदरों का काफी आतंक है। बंदर पकड़ने की कागजी खानापूरी कर बजट खपाया जा रहा है।
बंदर पकड़े तो मगर केवल खानापूर्ति
पार्षद सतीश कातिब मम्मा ने बताया कि उनके वार्ड में बंदर तो पकड़ने वाले आए तो थे लेकिन उनके आने से कोई असर नहीं पड़ा है। अब भी बंदरों के कारण लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बंदर पकड़ने के लिए सही इंतजाम नहीं हैं। सिर्फ खानापूरी की जा रही है। लोग सहमे रहते हैं कि कब कहां उन पर बंदर अचानक हमला कर दें। बंदर पकड़ने वाली फर्म के कर्मचारी आसिफ के मुताबिक अब तक करीब 15 सौ बंदर पकड़े जा चुके हैं। मंगलवार को छोड़कर हर दिन हम लोग बंदर पकड़ने जाते हैं। बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ा जा रहा है। जहां से भी शिकायत आती है, वहां हम लोग बंदर पकड़ने के लिए जा रहे हैं।
देवी-देवताओं के पोस्टर सौ रुपये में, लंगूर का ढाई सौ रुपये का
शहर में बंदरों का आतंक कितना बढ़ गया है, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस साइज और क्वालिटी के देवी-देवताओं के पोस्टर सौ या 120 रुपये तक के मिल जाते हैं, उसी साइज का लंगूर का पोस्टर ढाई सौ रुपये का मिल रहा है। चौपुला पुल के नीचे लंगूर के पोस्टर और कटआउट बेच रहे कैलाश ने बताया कि पहले वह पूरे दिन में दो-चार ही कटआउट बेच पाते थे लेकिन अब यह संख्या 15-20 तक पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि वह करीब एक साल से यह काम कर रहे है। कटआउट का रेट 650 और पोस्टर 250 रुपये का है। दावा किया कि लंगूर का पोस्टर देखने के बाद बंदर नजदीक नहीं आते।
