लखनऊः नफरत और पूर्वाग्रह को मिटाने में शिक्षा का बड़ा सहयोग, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में विशेष कार्यक्रम का आयोजन

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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लखनऊ, अमृत विचारः एजुकेशन डे के अवसर पर मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर उर्दू लेखक, कवि और आलोचक प्रो. सिराज अजमली मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। प्रो. सिराज ने कहा कि मौलाना आजाद के व्यक्तित्व और स्वभाव को उच्च स्तर के धार्मिक विचारों ने आकार दिया था। उनके स्वभाव में विरोधाभासों की एक श्रृंखला थी, लेकिन इसके बावजूद, उनकी साहित्यिक स्थिति को न केवल बहुत जल्द पहचान मिली, बल्कि वे एक सम्मानित और प्रतिष्ठित लेखक थे। हाली विशबली जैसे मशहूर लेखक ने उनके व्यक्तित्व पर भरोसा जताया। विश्वविद्यालय के सेंट लाइट परिसर में मौलाना आजाद स्मृति उपदेश के दौरान उन्होंने मौलाना आजाद की साहित्यिक और पत्रकारिता उपलब्धियों के विषय पर कहा कि हमें शिक्षा के संबंध में मौलाना आजाद के दृष्टिकोण को याद रखना होगा नफरत और पूर्वाग्रह को शिक्षा से ही मिटाया जा सकता है, शिक्षा से ही अंधकार मिटाया जा सकता है एक सपना देखा। 

इस अवसर पर रीडिंग आजाद और बैत बाजी प्रतियोगिताओं में स्थान पाने वाली टीमों को प्रोफेसर सिराज अजमली के हाथों मोमेंटो और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर कैंपस के छात्रों की दीवार पत्रिका, जिसे 'कहा जाता है। 'कारवां ख्याल' का उद्घाटन कैंपस प्रभारी प्रोफेसर सिराज अजमली, डॉ. हुमा याकूब और अन्य शिक्षकों ने किया।  कार्यक्रम की शुरुआत बीए के छात्र मोहम्मद अशरफ द्वारा पवित्र कुरान के पाठ से हुई। डॉ. अकबर अली ने आज़ाद घटनाओं की एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। आजाद कार्यक्रमों के समन्वयक डॉ. उमीर मंज़र ने निज़ामत की भूमिका निभाई और संयोजक डॉ. रियाज़ अहमद गनई ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

प्रो. सिराज अजमली ने कहा कि मौलाना आजाद ने अपनी राह खुद बनाई, ग़बर ख़ातिर मौलाना की भावनाओं और उनके साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति हैं, जो कविता और गीतात्मक अभिव्यक्ति पर आधारित है अजमली ने कहा कि मौलाना आज़ाद न केवल उनकी संस्कृति के संदर्भ थे बल्कि यह उनकी स्मृति का हिस्सा था। स्मृति उपदेश के दौरान प्रोफेसर सिराज अजमली ने यह भी कहा कि मौलाना आजाद की पत्रकारिता अभिव्यक्ति भी एक शुद्ध साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है आजाद ने अपना रास्ता खुद बनाया। उनके पास विचारों और विचारों की एक ऊंची दुनिया थी, जहां केवल एक मुजतहिद ही पहुंच सकता था बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, छात्र-छात्राएं एवं अतिथिगण उपस्थित थे।
 

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