बरेली: हालातों से हारा अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, बन गया मजदूर

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शिवांग पांडेय, बरेली। किस्मत ने उससे आवाज छीन ली थी मगर हुनर की उसमें कोई कमी नहीं थी। वह न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था पर सपने जरूर देखता था। उम्मीदों को पंख लगे और सपनों ने परवाज भरी तो बरेली का मेहताब अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक सितारा बनकर चमकने …

शिवांग पांडेय, बरेली। किस्मत ने उससे आवाज छीन ली थी मगर हुनर की उसमें कोई कमी नहीं थी। वह न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था पर सपने जरूर देखता था। उम्मीदों को पंख लगे और सपनों ने परवाज भरी तो बरेली का मेहताब अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक सितारा बनकर चमकने लगा।

उसे तकदीर बदलने की उम्मीद थी लेकिन व्यवस्था की अनदेखी ने एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट को मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया। वक्त बीता तो हालात बिगड़ते गए। न सिस्टम ने उसकी सुध ली और न ही जनप्रतिनिधियों ने मदद का हाथ बढ़ाया। आज वह एक निजी कंपनी में महज तीन सौ रुपये दिहाड़ी पर मजदूरी कर रहा है। यह दास्तान है चक महमूद निवासी अंतराराष्ट्रीय खिलाड़ी मेहताब हुसैन की।

पुराना शहर के चक महमूद निवासी मेहताब हुसैन जन्म से मूकबधिर हैं। गरीबी की वजह से उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया लेकिन उन्होंने विकलांगता को ही अपनी ताकत बना लिया। स्थानीय, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुके मेहताब ने वर्ष 2000 में ताईवान में हुए 6वें एशिया पैसिफिक गेम्स फॉर डीफ में भारतीय टीम में जगह बनाई थी।

विदेश जाने में जब गरीबी आड़े आई तो मां ने जमीन बेच दी। इस प्रतियोगिता में उन्होंने पांच हजार मीटर दौड़ में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया। भले ही वो इस प्रतियोगिता में जीत न सके हों लेकिन उनकी प्रतिभा देख कर हर कोई चकित रह गया। इसके बाद भी उन्हें कई बार विदेश जाने वाली टीम में चुना गया लेकिन गरीबी के कारण वह नहीं जा पाए।

हालात से हारी प्रतिभा
मेहताब हुसैन को पूरा भरोसा था कि देश-विदेश में खेलने के कारण उसे सरकारी नौकरी या कोई ऐसी मदद जरूर मिल जाएगी जिससे उनकी बेबसी का अंधियारा सदा के लिए मिट जाएगा लेकिन ऐसा हो न सका। उन्होंने कई बार मंत्री, सांसदों और विधायकों से भी गुहार लगाई लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। रोटी का संकट पैदा हुआ तो मेहताब के सामने मजदूरी के अलावा कोई चारा न रह गया। फिलहाल वह मजदूरी करके घर का खर्च चला रहा है।

पीएम केयर फंड में दी एक दिन की कमाई
शहर की एक कंपनी में महज 300 रुपये रोजाना पर मजदूरी करने वाले मेहताब को देश से आज भी बेहद लगाव है। कोरोना काल में जब प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सहयोग करने की अपील तो उन्होंने पीएम केयर फंड में अपनी एक दिन की मजदूरी दे दी।

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