शब्द रंग : वेदों का सिंहासन, सनातन की दिव्यता का ध्वजवाहक....

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Edited By Amrit Vichar
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बेंगलुरू एयरपोर्ट से पूर्वाह्न 11 बजे टैक्सी द्वारा हमने श्रंगेरी की यात्रा आरंभ की। रास्ते में बेलूर में रुककर प्राचीन चेन्नाकेशव मंदिर में दर्शन के बाद हमारा अगला पड़ाव हिरेमगलूर था। यह जगह कोडंडाराम मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मण को विवाह जुलूस के रूप में दर्शाया गया है। आखिरकार 320 किमी की दूरी करीब आठ घंटे में तय करके शाम सात बजे हम श्रृंगेरी में थे। यह कर्नाटक के चिकमंगलूर जिला का एक तालुका है। श्रृंगेरी का   इतिहास रामायण काल से भी पुराना है। महर्षि ऋष्यश्रृंग के निवास और कठोर तपस्या के कारण यह स्थान उनके नाम से जाना गया।

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ऋषि ऋष्यश्रृंग ने राजा दशरथ के लिए पुत्रकामेष्टि संस्कार संपन्न कराया था, जिसके बाद प्रभु श्रीराम और उनके भाइयों का जन्म हुआ। श्रृंगेरी की पवित्रता ने जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को अपनी अद्भुत अंतर्दृष्टि से आकर्षित किया था। यहां उन्होंने सनातन धर्म की पवित्र परंपरा को बढ़ावा देने के लिए 12 शताब्दी से भी पहले चार आम्नाय पीठों में से प्रथम पीठ की स्थापना की थी। अद्वैत वेदांत के प्रसार हेतु  संस्था की स्थापना के लिए पवित्र स्थान की खोज में श्रृंगेरी पहुंचने पर आदि शंकराचार्य ने पवित्र तुंगा नदी के तट पर एक अद्भुत दृश्य देखा, एक नाग प्रसव पीड़ा से कराह रहे एक मेढक को छाया प्रदान करने के लिए अपना फन फैलाकर उसे दोपहर की तपती धूप से बचा रहा था। प्राकृतिक प्रतिकूलताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली यह घटना देखकर उन्हें लगा कि यह स्थान अवश्य ही पवित्र है। इसी के बाद पहले मठ की स्थापना के लिए उन्होंने श्रृंगेरी को चुना।  

शारदम्बा मंदिर व पीठम के बीच से बहती तुंग नदी

श्रृंगेरी नगर का अस्तित्व शारदम्बा मंदिर एवं श्रृंगेरी शारदा पीठम से है जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में की थी। इन दोनों के मध्य से तुंग नदी बहती है। छोटे से श्रृंगेरी नगर में 40 से अधिक मंदिर हैं। लेकिन सबसे प्रसिद्ध  शारदा शक्तिपीठम और विद्याशंकर मंदिर हैं। यहां हमने एक ऊंचे राज गोपुरम अथवा गोपुर से शारदम्बा मंदिर के भीतर प्रवेश किया। 2014 में निर्मित यह राज गोपुरम इस प्राचीन मंदिर के इतिहास में एक नवीन कड़ी है। शारदा देवी श्रृंगेरी की प्रमुख पीठासीन देवी हैं। कहा जाता है कि जब आदिशंकर कश्मीर में कुछ समय व्यतीत कर वापस आये थे, तब वे शारदा देवी को वहां से श्रृंगेरी लाये थे। मंदिर के भीतर शारदा देवी एक माला हाथ में लिए एक चक्र पर आरूढ़ हैं। शारदा देवी की मूल प्रतिमा चन्दन काष्ठ में बनी है। स्वर्ण में निर्मित वर्तमान प्रतिमा संत विद्यारण्य द्वारा 14वीं सदी में स्थापित की गयी थी।

संत विद्यारण्य श्रृंगेरी मठ के बारहवें शंकराचार्य थे। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। शारदम्बा यहां देवी सरस्वती का प्रतिनिधित्व करती है। यहां देवी को मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती का अवतार भी मानते हैं। ये वही देवी भारती हैं जिनका आदि शंकराचार्य के साथ शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। लगभग 100 वर्ष पूर्व तक सम्पूर्ण मंदिर चंदन की लकड़ी का बना था। किन्तु एक अग्निकांड में जल गया था। अब जो मंदिर यहां है वह अग्निकांड के पश्चात द्रविड़ पद्धति से पुनर्निर्मित है।

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12 राशियों के लिए 12 स्तंभ, सूर्य की पड़ती पहली किरण

पुरातत्व की दृष्टि से विद्याशंकर मंदिर श्रृंगेरी का सर्वाधिक आकर्षक मंदिर है। यहां कुल 12 स्तंभ हैं जो 12 राशियों के प्रतीक हैं। जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है तब उसकी प्रथम किरणें उस राशि के प्रतीकात्मक स्तंभ पर गिरती हैं। मंडप के मध्य स्थित गोलाकार आकार की ग्रेनाइट शिला पर तिरछी रेखाएं उत्कीर्णित हैं। मंदिर का निर्माण करते समय इन रेखाओं का प्रयोग कर स्तंभों के सटीक स्थान की गणना की गयी होगी। गर्भगृह के भीतर काली शिला में एक बड़ा शिवलिंग है। इसे विद्याशंकर लिंग कहा जाता है। शिवलिंग के बाईं ओर विद्या गणपति की काले पत्थर की प्रतिमा है। दायीं ओर दुर्गा के रूप में देवी की प्रतिमा है। सूर्योदय की किरणें सीधे विद्याशंकर लिंग पर पड़ती हैं।

विद्याशंकर मंदिर में 6 पंथों के भगवान की प्रतिमाएं

14वीं  शताब्दी में जब हम्पी में विजयनगर साम्राज्य था, उस समय गुरु विद्याशंकर के लिए विद्याशंकर मंदिर बनवाया गया था। एक ऊंचे मंच पर स्थापित यह आयताकार मंदिर है। मंदिर की बाह्य भित्तियों पर उत्कीर्णित प्रतिमाएं आदि शंकराचार्य द्वारा परिभाषित 6 पंथों के भगवान की हैं। ये 6 पंथ हैं, शिव, विष्णु, षन्मुख, देवी, गणेश एवं सूर्य। आदि शंकराचार्य मंदिर, शारदम्बा मन्दिर के पीछे छोटा किन्तु सुन्दर मंदिर है। यह आदि शंकराचार्य को समर्पित है। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर उनकी जीवनी पर आधारित मनमोहक चित्र हैं। 

चारों दिशाओं में स्थापित हैं मंदिर

आदि शंकराचार्य ने श्रृंगेरी की चार दिशाओं में चार छोटे मंदिरों की स्थापना की थी। पश्चिम में केरे आंजनेय मंदिर, पूर्व में काल भैरव, दक्षिण में दुर्गाम्बा तथा उत्तर में कालिकाम्बा मंदिर है। यहां शारदा पीठम के वर्तमान शंकराचार्य वंशावली में 36 वें क्रमांक पर आते हैं। श्रृंगेरी शारदा पीठम में अधिकतर पूर्व शंकराचार्यों की समाधियां हैं। गुरु निवास विशाल कक्ष है, जहां शंकराचार्य भक्तों को दर्शन देते हैं। 

कैसे पहुंचे : विमान से जाने पर मंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट करीब 105 किमी दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन लगभग 80 किमी दूरी पर उडुपी है। चिकमंगलूर से सड़क मार्ग से दूरी 100 किमी है।  बेंगलुरू, मैसूर और उडुपी से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

लेखक: अजय त्रिवेदी, उपनिदेशक, युवा कल्याण विभाग