Gandhi Jayanti Special: गांधीजी के महात्मा कहलाने की कहानी में कानपुर... चंपारण आंदोलन से भी जुड़े हैं तार
-चंपारण आंदोलन की नींव प्रताप प्रेस में पड़ी, राजकुमार शुक्ला ने यहीं गांधी जी को सुनाई थी किसानों पर अत्याचार की व्यथा-कथा और अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता
-इसके बाद बिहार के चंपारन गए थे गांधीजी और फिर वहां कई दिन प्रवास किया, किसान हित के लिए खड़ा किया बड़ा और बेहद सफल निर्णायक आंदोलन
शैलेश अवस्थी, कानपुर। गांधीजी का पहला सफल आंदोलन था बिहार के चंपारन का, जिसकी नींव कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप अखबार कार्यालय में रक्खी गई थी और साथ ही गांधी जी के "महात्मा" कहलाने की कहानी भी यहीं से शुरू हुई।
दस्तावेज और पुस्तकों के मुताबिक दिसंबर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन था। वहां चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ला भी पहुंचे और किसानों पर अत्याचार की बात अपने भाषण में बताई। साथ ही गांधीजी को चंपारण आने का न्योता दिया, लेकिन गांधीजी ने अनमने ढंग से हां में सिर हिला दिया। 31 दिसंबर 1916 को गांधीजी गणेश शंकर विधार्थी के आमंत्रण पर पहली बार कानपुर आए तो पीछे से राजकुमार शुक्ला भी आ गए और फिर 1 जनवरी 1917 को प्रताप प्रेस कार्यालय, जहां गांधी जी ठहरे थे, वहां राजकुमार शुक्ला ने उनसे भेंट कर चंपारन चलने की बहुत जिद की।
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कानपुर इतिहास समिति के सचिव अनूप शुक्ल बताते हैं कि तब विधार्थी जी ने गांधी जी को चंपारन किसानों पर हो रहे अत्याचार की वास्तविकता बताते हुए प्रताप अख़बार पर छपी वहां की ख़बरें दिखाई। चंपारन से प्रताप अखबार के लिए मीर मोहम्मद मुनीश रिपोर्टिंग करते थे। यह सब पढ़ने और राजकुमार शुक्ला से पूरी बात सुनने के बाद गांधी जी गंभीर हो गए और चंपारण जाने को तैयार हो गए। वहीं बैठकर इस मुद्दे पर विचार-विमर्श किया और आंदोलन की रुपरेखा बनाई।
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इसके बाद गांधी जी अप्रैल 1917 को चंपारण पहुंचे और किसानों के हालात देख द्रवित हो गए। नील की खेती के दबाव और अंग्रज हुकूमत का किसानों पर अत्याचार चरम पर था। गांधी जी ने वहीं प्रवास का निर्णय लिया, किसानों और सभी को संगठित कियाl सत्याग्रह शुरू किया और फिर आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया, जिसकी गूंज पूरे देश तक पहुंच गईl वहीं राजेंद्र प्रसाद जी से गांधी जी की मुलाक़ात हुई और फिर वह भी आंदोलन में कूद पड़ेl उन्होंने किसानों के मुक़दमें लड़े।
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अंग्रेज हुकूमत हिल गई और उसे झुकना पड़ाl किसी हद तक किसानों की मांगे पूरी हुईं और इस सफल आंदोलन के बाद गांधी जी पूरे देश में छा गएl राजेंद्र बाबू ने यहीं गांधी जी को पहली बार महात्मा कह कर सम्बोधित किया फिर वहीं से एक नए गांधी का प्रदुर्भाव हुआ, जिसने आज़ादी की इबारत लिखीl
सात बार आए, 22 दिन प्रवास किया...
गांधी जी सात बार कानपुर आए और इस दौरान 22 दिन प्रवास किया। वह कांग्रेस अधिवेशन, स्वदेशी स्टोर के उद्घाटन, स्वदेशी प्रदर्शिनी और तिलक हाल के उद्घाटन के लिए भी आए। वह हसरत मोहानी, नारायण प्रसाद अरोड़ा और मुरारी लाल, गणेश शंकर विद्यार्थी जी से अक्सर विचार-विमर्श करते थे।
