कानपुर: आईआईटी छात्र की मौत से टूट गया परिवार... बोले परिजन- 24 घंटे में एक बार तो हॉस्टल के कमरों में बच्चों को देखा जाए
कानपुर, अमृत विचार। काफी संघर्ष के बाद बेटे धीरज सैनी को आईआईटी से बीटेक करता देख गर्व महसूस होता था। पांच-छह माह बाद वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हो जाता। उसने कहा था कि जल्द ही प्लेटमेंट मिल जाएगा। सोचा था कि गरीबी दूर होगी। लेकिन गर्व के साथ परिवार भी टूट गया। यहां उसकी रहस्यमयी मौत होगी पता नहीं था। यह कहते हुए हरियाणा निवासी धीरज सैनी के ताऊ सत्येंद्र फफक पड़े। कहा, धीरज के चाचा संदीप सुबह चार बजे फल की रेहड़ी लगाकर पढ़ाई का खर्च उठाते थे। मेरा मेधावी और होनहार चला गया। दो दिन उसका शव फंदे से लटका रहा और किसी को पता नहीं चला।
हरियाणा के महेंद्रगढ़ ककरकई गांव निवासी 22 वर्षीय इलेक्ट्रिकल से बीटेक फाइनल के छात्र धीरज सैनी के ताऊ सत्येंद्र, चाचा संदीप व बड़ा भाई नीरज गुरुवार को पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। उन्होंने बताया कि धीरज प्राइमरी स्कूल से ही मेधावी था। इंटर के बाद वह राजस्थान के सीकर तैयारी करने गया। एक साल की कोचिंग में ही उसे आईआईटी में प्रवेश मिल गया। सबकुछ तो ठीक था, वह जल्द ही प्लेसमेंट की बात कह रहा था, फिर ऐसा क्या हुआ कि यह कदम उठा लिया।
सवाल भी उठाए, कहा कि दो दिन उसका शव हॉस्टल के कमरे में लटका रहा, किसी को पता नहीं चला। कम से कम 24 घंटे में तो एक बार देखना चाहिए। उन्होंने बेटे से कहा था कि एनआईटी में प्रवेश ले, लेकिन वह तो सिर्फ आईआईटी ही जाना चाहता था। सोचा था घर का सपना पूरा करेगा, लेकिन साथ ही छोड़ गया। धीरज मई माह में आखिरी बार घर आया था। वह ज्यादा किसी से बात नहीं करता था। अच्छा एथलीट होने के साथ वह क्रिकेट और अन्य खेलों का भी शौक रखता था। आईआईटी क्रिकेट टीम का वाइस कैप्टन भी था।
कानपुर निवासी रिश्तेदार एसएन सैनी ने बताया कि आईआईटी में उसकी रहस्यमय ढंग से मौत हुई है। पोस्टमार्टम के बाद परिजन शव लेकर चले गए। पोस्टमार्टम हाउस पर धीरज के साथी छात्र, फैकल्टी भी मौजूद रहे। बतादें कि एक नंबर हॉस्टल में रहता था। बुधवार दोपहर बाद छात्र के कमरे से बदबू आने पर हॉस्टल प्रबंधन व कल्याणपुर पुलिस दरवाजा तोड़कर पहुंची तो उसका शव फंदे से लटकता पाया था।
मां को नहीं बताया, वह दम तोड़ देती
धीरज के चाचा संदीप ने बताया कि उसके मौत की खबर अभी तक उसकी मां को नहीं दी गई है। अगर उसे पता चल जाता तो वह दम तोड़ देती। गांव शव लेकर पहुंचने पर किसी तरह उसे बताया जाएगा। फिर पता नहीं क्या होगा। वह बेटे से अक्सर कहती थी कि प्लेसमेंट की चिंता मत करना, तनाव मत लेना। बस पढ़ाई मन से करना।
चाचा ने रेहड़ी लगाकर पढ़ाया धीरज को
ताऊ सत्येंद्र ने बताया कि धीरज के चाचा संदीप सुबह चार बजे फल की रेहड़ी लगाकर संघर्षों से उसे बढ़ाया। सुबह चार बजे से रात 11 बजे तक रेहड़ी के पास खड़े रहते थे। प्राथमिक स्तर की पढ़ाई के समय उसकी फीस का डेढ़ लाख रुपया बकाया था, तब स्कूल से रिजल्ट नहीं दिया गया। इस पर कर्ज लेकर फीस चुकाया था। फिर कर्ज उतारा। लेकिन सबकुछ खत्म हो गया।
