व्यवस्था पर चोट और व्यंग्य का ताना-बाना: जी लो जिंदगी व राजा मूँछो सिंह

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज के प्रेक्षागृह में रंगमंच की एक ऐसी शाम सजी, जिसने दर्शकों को हंसी और विचार दोनों से भर दिया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, शैलनट और आनंदा अकादमी हल्द्वानी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक माह की अभिनय एवं नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला की परिणति स्वरूप दो नाटकों का भव्य मंचन हुआ।
कार्यशाला में प्रशिक्षित कलाकारों में अधिकांश पहली बार मंच पर उतरे थे, किंतु एनएसडी के रंगकर्मी चंदन बिष्ट, चित्रा बिष्ट और शैलनट के संस्थापक श्रीश डोभाल के मार्गदर्शन ने उन्हें ऐसा आत्मविश्वास और परिष्कार दिया कि दर्शक उनकी नवीनता भूल बैठे। 

अभिनय की सहजता और संवादों की पैनी पकड़ इस बात का प्रमाण थी कि एक माह का यह अभ्यास किसी गहन साधना से कम नहीं रहा। पहला नाटक जी लो जिंदगी, रूस के प्रसिद्ध नाटककार निकोलाई एडमैन की द सुसाइड से प्रेरित था। यह नाटक एक बेरोजगार युवक गुमान सिंह (अथर्व नेगी) की कथा है, जो सास (योगिता भंडारी) और समाज के तानों से जूझते हुए जीवन से हार मान लेता है। 

विभिन्न संगठनों और संस्थाओं के स्वार्थपूर्ण शोषण से निराश गुमान आत्महत्या जैसा कदम उठाने को बाध्य होता है, किंतु जीवनसंगिनी गीता (संस्कृति लोहनी) का सहयोग और आत्मचिंतन उसे नए उद्देश्य की ओर ले जाता है। गुमान सिंह के रूप में अथर्व नेगी ने अपनी गहन संवेदना से दर्शकों को बांधे रखा, वहीं संस्कृति लोहनी और योगिता भंडारी ने अपने पात्रों को प्राणवान बना दिया। गौरव जोशी ने ठेकेदार के रूप में नाटक में तीखापन और धार जोड़ी। यह नाटक न केवल बेरोजगारी की पीड़ा, बल्कि व्यवस्था की खोखली परतों और स्वार्थी संगठनों पर करारा व्यंग्य था।

दूसरा नाटक राजा मूंछो सिंह एक हल्का-फुल्का व्यंग्य था, जो गंभीर संदेश भी छोड़ गया। राजा (ज्योति जीना) अपनी मूंछों को ही अपनी सत्ता और शान मान बैठता है। नतीजा-राजाज्ञा से सब कुछ मूंछों वाला होना चाहिए, पलंग से लेकर बच्चों के खिलौनों तक। दरबार में मंत्री, कवि, प्रजा सब मूंछों की प्रशंसा में गीत गाते और लाभ उठाते हैं। यहां तक कि चोर-उचक्के भी मूंछों पर कविता सुनाकर सजा मुक्त हो जाते हैं। इस रंग-व्यंग्य के बीच जब एक पड़ोसी राज्य का जासूस नाई बनकर मूंछें काट देता है, तब राजा को अपने कर्तव्य का बोध होता है कि राजधर्म शान-शौकत में नहीं, प्रजाहित में है। 

रानी (गुंजन अधिकारी) और नटी (मयाली पांडे) व दुश्मन देश के सैनिक के रूप में वैभव बेलवाल ने अपने सहज और चुलबुले अभिनय से नाटक को जीवंत बनाया। दोनों प्रस्तुतियां दर्शाती हैं कि मंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का आईना और प्रश्न करने का माध्यम भी है। जी लो जिंदगी जहां व्यवस्था और बेरोजगारी की चुभन को उघाड़ता है, वहीं राजा मूंछो सिंह व्यंग्य और हंसी के जरिए सत्ता के असली कर्तव्यों की याद दिलाता है। हल्द्वानी की इस रंग-संध्या ने सिद्ध कर दिया कि थोड़े समय की सघन साधना भी यदि सही मार्गदर्शन और समर्पण से हो तो वह मंच पर अद्भुत प्रभाव छोड़ सकती है।-हरीश उप्रेती करन, हल्द्वानी