केवल अतिक्रमणकारियों पर ही नहीं, दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी होगी कार्यवाही : इलाहाबाद हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तालाबों, चरागाहों और ग्रामसभा की अन्य सार्वजनिक भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण को “प्रकृति और संविधान पर हमला” मानते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में कड़ा और ऐतिहासिक आदेश पारित कर स्पष्ट किया कि अब केवल कागज़ी कार्रवाई नहीं चलेगी और 90 दिनों के भीतर पूरे प्रदेश से सरकारी भूमि पर हुए अवैध कब्जे हटाना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक भूमि केवल सरकारी नहीं, बल्कि जनता की संपत्ति है और उसके संरक्षण में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। मामले पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकलपीठ ने पाया कि मिर्जापुर के ग्रामीणों ने एक तालाब पर अतिक्रमण कर लिया था।
उसे हटाने के लिए 2006 की धारा 67 के तहत कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने कहा कि जलाशयों पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं होगा। इसे भारी जुर्माने और दंड के साथ हटाया जाए। तालाब, झील, चरागाह और अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि प्रबंधक समिति के ट्रस्ट की तरह होती है, जिसके अध्यक्ष ग्राम प्रधान और सचिव लेखपाल होते हैं।
इनके ऊपर यह कानूनी जिम्मेदारी है कि अतिक्रमण होते ही तुरंत तहसीलदार को सूचना दें। कोर्ट ने चेतावनी दी कि चुप्पी या देरी, अवैध कब्जे को बढ़ावा देने जैसा अपराध है और इसे गंभीरता से लिया जाएगा। कोर्ट ने पर्यावरणीय प्रभावों पर जोर देते हुए कहा कि जलाशयों पर कब्जा भूजल संकट, प्रदूषण, जैव विविधता की हानि और जनता के स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन करता है, साथ ही यह समान संसाधनों के समान उपयोग (अनुच्छेद 14) का भी हनन है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देशित करते हुए कहा कि ग्राम प्रधान और लेखपाल को 60 दिनों के भीतर आरसी फॉर्म 19 के माध्यम से अतिक्रमण की सूचना देना होगी। इसके बाद तहसीलदार धारा 67 (यूपी राजस्व संहिता, 2006) के तहत नोटिस जारी कर 90 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाकर भूमि बहाल करेंगे।
देरी या कारण न दर्ज होने पर यह नियम 195 (राजस्व नियमावली, 2016) के तहत कदाचार माना जाएगा और अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अपील लंबित होने मात्र से स्वतः स्थगन नहीं माना जाएगा। सबसे सख्त कार्रवाई उन अधिकारियों के खिलाफ होगी जो ग्रामसभा भूमि की सुरक्षा में विफल पाए गए।
ऐसे मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात, षड्यंत्र और दुष्प्रेरण के मुकदमे दर्ज होंगे। ग्राम प्रधान को पंचायत राज अधिनियम की धारा 95(1)(जी)(iii) के तहत पद से हटाया जा सकता है। तहसीलदार और एसडीएम भी इससे बचे नहीं रहेंगे। 90 दिनों में कार्रवाई पूरी नहीं की तो विभागीय और आपराधिक कार्यवाही दोनों होगी।
कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि अतिक्रमण हटाने में “पूरा सहयोग” दें और कार्रवाई “शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़” तरीके से की जाए। अतिक्रमण की शिकायत करने वाले व्यक्ति को हर स्तर पर सुनवाई का अधिकार होगा। आदेश का पालन न होने पर दोषी अधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना कार्यवाही भी शुरू की जाएगी।
प्रदेशव्यापी निगरानी की भी व्यवस्था की गई है। सभी जिलाधिकारी, एसडीएम, तहसीलदार और तहसीलदार (न्यायिक) 90 दिनों के भीतर कार्रवाई पूरी करेंगे। अपर मुख्य सचिव (राजस्व) और संबंधित विभाग यह आदेश हर जिले और राजस्व कार्यालय तक पहुँचाएँगे। हर साल जिलाधिकारी और विभागीय प्रमुख अतिक्रमण हटाने की वार्षिक रिपोर्ट सरकार को देंगे। यदि उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों की लापरवाही पर कार्रवाई नहीं करते, तो उनकी भूमिका भी षड्यंत्र या उकसावे के रूप में मानी जाएगी।
कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि अतिक्रमण करने वाला ही दोषी नहीं, उसे रोकने में चूक करने वाला अधिकारी भी अपराधी माना जाएगा। यह आदेश न केवल प्रशासनिक तंत्र को झकझोरने वाला है, बल्कि उत्तर प्रदेश के जलस्रोतों, पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
