बदहाल हो रहा ‘पूरब का ताजमहल’

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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फिल्म निर्माता मुजफ्फर अली की फिल्म उमराव जान के एक गीत को अक्सर लोगों को गुनगुनाते हुए सुना जाता है। दिल चीज क्या है जान लीजिए, दीवार-ओ-दर को गौर से पहचान लीजिए…इसके सुर, लय और ताल के साथ ही दिल में स्पंदन और मानस पटल पर कई तस्वीरें एक साथ उभरती हैं। फिल्म में उस दीवार और दर का संबंध कहां से है यह अलग बात है, लेकिन अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) से इस दीवार और दर का गहरा नाता है। फिल्म के कई सीन फैजाबाद में पूरब का ताजमहल कहे जाने वाले वर्तमान अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के बहू बेगम मकबरे की बारादरी में शूट किए गए थे। वर्तमान में यह ऐतिहासिक इमारत क्षरण के दौर से गुजर रही है। खंडहर में बदल रही है। अवैध कब्जे हो रहे हैं। कहने के लिए यह पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, लेकिन स्थिति ठीक नहीं है। कभी यह तत्कालीन फैजाबाद की शान थी। -राजेंद्र कुमार पांडेय

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पूरब के ताज महल बहू बेगम मकबरा का निर्माण अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला (जन्म 19 जनवरी 1732, निधन 26 जनवरी 1775) ने ईस्ट इंडिया कंपनी से 22-23 अक्टूबर 1764 को लड़ाई हारने, फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाने और अकाल के दौर में लोगों को काम देने के लिए अपनी पत्नी उम्मत-उज-जोहरा (जिन्हें बाद में बहू बेगम के नाम से जाना गया) के लिए शुरू कराया था। यह गैर-मुस्लिम वास्तु कला का उत्कृष्ठ नमूना है। जानकारी कहते हैं कि इसमें ईरान से आए कारीगर और सामानों के साथ देशी मजदूरों और सामान का प्रयोग किया गया।

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 हालांकि नवाब इसे पूरा नहीं करा पाए। जिम्मेदारी उनके बेटे आसफुद्दौला के पास आई, लेकिन लखनऊ को राजधानी बनाने के बाद उसने इसे इसके हाल पर छोड़ दिया तो बहू बेगम ने निर्माण को आगे बढ़ाया। निर्माण के दौरान ही उनकी भी मौत हो गई, लेकिन उन्होंने इसके लिए धनराशि की व्यवस्था पहले से कर रखी थी। इसी से उनके खास सिपहसालार दाराब अली खान ने 42 मीटर ऊंचे मकबरे का निर्माण पूरा कराया, जहां से पूरे शहर को देखा जा सकता है।

शहर के मौलाना जफर अब्बास कुम्मी बताते हैं कि बहू बेगम मकबरे के साथ की इमारतें नवाबी शान-ओ-शौकत का बेजोड़ नमूना है। इसके निर्माण में चार सौ मजदूर आठ साल तक लगातार लगे रहे। नवाबी काल में पूरब के ताजमहल के साथ व्यवस्थित शहर बसाने के लिए कई निर्माण कराए गए। इनमें गुलाबबाड़ी के साथ चौक की ऐतिहासिक घंटाघर सहित इकदरें और तीन दरें है। चौक में ही सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद हसन रजा खां भी है। 

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नवाबी काल में चौक ही बाजार हुआ करती थी। शहर फैजाबाद के चौक इलाके की पहचान चारों ओर बने दरों (मेहराबदार दरवाजे) से भी होती है। इन्हीं दरों के बीच शहर का महत्वपूर्ण बाजार बसता था। इसे त्रिपोलिया कहा जाता था, जहां दुकानें होती थीं। अब इसे घंटाघर के नाम से जाना जाता है। यहां मौजूद दुकानों में अब भी कई सैकड़ों साल पुरानी हैं। इन दरों पर यूरोपियन शैली के बेलबूटे उकेरे गए हैं। यह दरें एक प्रकार से इंट्री गेट थे। बाजार को वास्तु और ज्योतिषीय गणना के हिसाब से अर्ध चंद्राकार बनाया गया है। दरों को बनाए जाने का मकसद रायल बाजार को सुरक्षा और भव्यता देना था। शाही परिवार से या फिर दूसरे लोग बाजार में दाखिले के लिए इसी गेट से अंदर जा सकते थे। उनकी जांच पड़ताल की जा सकती थी। दरों की नक्काशी भी अद्भुत थी। 

लखौरी ईंटों और चूना सुर्खी से बने इन दरों पर उकेरे गए बेलबूटे की नक्काशी आकर्षण का केंद्र थी। दरों के दोनों किनारों पर दो बड़ी मछलियों की तस्वीर उकेरी गई है। यह शाही चिह्न था। इनकी भी अलग एक कहानी है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने इसी से राज चिह्न लिए जाने की बात कही जाती है। दरों की नक्काशी और मछलियों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है। अब तो इनका क्षरण हो रहा है, लेकिन किसी समय में यह शहर की शोभा थे। पिछले कुछ दिनों से पूर्वी तिनदरें की मरम्मत के साथ सजाया, संवारा और संरक्षित किया जा रहा है। वहां लगाए गए मजदूर बताते हैं कि इसे उसी पद्धति से बनाया जा रहा जैसे यह पहले बना था। उम्मीद है कि इसका आकर्षण फिर वापस लौटेगा। 

-शहर के बीचो-बीच स्थित घंटाघर शहर की एक पहचान है। कभी घंटाघर के समय की आवाज पर शहर सोता और जागता था। घंटाघर को बलरामपुर स्टेट के राजा ने जार्ज फिफ्थ के भारत आने पर खुशनूदी में लगवाया था। इसकी तकनीक अद्भुत थी। इसे लंदन से मंगवाकर स्थापित किया गया था। कभी यह घड़ी पानी की लहरों से चलती थी। इसकी आवाज पूरे शहर को सुनाई पड़ती थी। बाद में यह अपनी आभा खोता चला गया।

नगर पालिका फैजाबाद के पूर्व चेयरमैन विजय गुप्ता बताते हैं कि घड़ी के चलने के लिए घंटाघर के नीचे एक कुंआ है। यहां से घिर्री और महीन तार से ऊपर की सुई व घंटे को जोड़ा गया था। कुएं के पानी में एक बार लहर उत्पन्न करने के बाद यह लगातार चलती और समय बताती रहती थी, लेकिन बाद में खराब हो गई। उन्होंने दो बार इसकी मरम्मत कराई। बरेली के कारीगर से इसे ठीक कराया गया। पहली बार कुएं के पानी से चली, लेकिन घिर्री और तार न मिलने के कारण दोबारा, उन्होंने इस पर इलेक्ट्रॉनिक घड़ी लगवाई। साल भर चलने के बाद यह भी बंद हो गई। बीच में इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी अयोध्या विकास प्राधिकरण ने भी ली थी, लेकिन बाद में वापस कर दिया। इस समय इसकी जिम्मेदारी नगर निगम के पास है, लेकिन शहर की शान घंटाघर की घड़ी बंद पड़ी है।

-नवाबी काल की इमारतें अब अवैध कब्जों और रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो रही हैं। इनका आकर्षण खोता जा रहा है। चाहे वह गुलाबबाड़ी की दरें हों या फिर बहू बेगम के मकबरे का दरा। बहू बेगम मकबरे के दरें में कहीं दफ्तर तो कहीं स्कूल चल रहे हैं। चौक के दरे तो जगह-जगह रगड़ से टूट गए। अवैध कब्जे और गंदगी, अव्यवस्था से यह अपने हाल पर आंसू बहा रहे हैं। मरम्मत और रंगरोगन के अभाव में इनकी आभा जाती रही।