मोबाइल की लत से अराजक होता बचपन 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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पद्माकर पाण्डेय, लखनऊ। अत्याधुनिक तकनीक से जहां दुनिया करीब आई है, वहीं बच्चों में मोबाइल गेम्स की लत वर्तमान में एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। अत्यधिक या अनुचित उपयोग बच्चों में कई नकारात्मक घटनाओं का कारण बन सकता है। फ्री फायर जैसे हिंसात्मक या फाइटिंग गेम्स खेलने से बच्चों में आक्रामकता, चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ रहा है। सोशल इंटरेक्शन की कमी के कारण सामाजिक व्यवहार में बदलाव आता है। छोटे बच्चे वाले अधिकांश घरों में स्थिति एक जैसी है, अभिवावक सबकुछ समझते हुए अनजान बने हुए हैं, मगर हाल की कुछ घटनाएं और ओपीडी में बढ़ने वाली बच्चों की संख्या से, एक बार फिर मोबाइल गेम्स की लत और उसके गंभीर दुष्प्रभावों पर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।          

गेम की लत बना रही बच्चों को चिड़चिड़ा और असंतुलित 

मोबाइल गेम्स की लत बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। हालांकि किसी विशेष मामले में बिना पूरी जानकारी के सटीक टिप्पणी करना संभव नहीं है, लेकिन सामान्य तौर पर देखा गया है कि लगातार मोबाइल पर गेम खेलने वाले बच्चों में नकारात्मकता, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता जैसे लक्षण तेजी से उभरते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर इंपल्सिव यानी बिना सोचे-समझे निर्णय लेने वाले हो जाते हैं। उनके भीतर गुस्सा, धैर्य की कमी, और याददाश्त में कमी जैसे मानसिक बदलाव दिखाई देते हैं। साथ ही पढ़ाई में मन न लगना, एक आम समस्या बनती जा रही है। अभिभावकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा दिनभर में कितनी देर मोबाइल इस्तेमाल कर रहा है। सलाह दी कि बच्चों को अलग से मोबाइल फोन नहीं देना चाहिए। यदि पढ़ाई के लिए मोबाइल की आवश्यकता हो, तो वह परिवार का साझा मोबाइल होना चाहिए, जिसे बच्चा अकेले कमरे में ले जाकर उपयोग न कर सके। मोबाइल का इस्तेमाल ऐसे माहौल में होना चाहिए, जहां अन्य सदस्य भी मौजूद हों। सही मार्गदर्शन से ही बच्चों को इस डिजिटल लत से बचाया जा सकता है।

--- डॉ. आदर्श त्रिपाठी , बाल मानसिक रोग विशेषज्ञ, केजीएमयू  

मोबाइल गेम बन रहे बच्चों के लिए नशा, बढ़ रही समस्याएं

जैसे शराब और सिगरेट का नशा धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही मोबाइल गेमिंग की लत भी बच्चों में गहराती जाती है। शुरुआत में बच्चा 10 मिनट गेम खेलकर जितना संतुष्ट होता है, कुछ समय बाद वही संतुष्टि पाने के लिए उसे आधा घंटा, फिर कई घंटे तक खेलना पड़ता है। यह एक प्रकार का नशा है, जो मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों में बच्चों को प्रभावित करता है। इनमें हिंसा, गोलीबारी और अत्यधिक उत्तेजना वाले कई लेवल होते हैं, जिससे खेलने के दौरान बच्चे में अचानक उत्तेजना बढ़ जाती है, हृदय गति तेज हो जाती है और गंभीर स्थिति में हृदयाघात (हार्ट फेल) तक हो सकता है। इसलिए उन्होंने अभिवावकों को चेताया कि यदि बच्चा पढ़ाई से दूरी बना रहा हो, मोबाइल पर ज्यादा समय बिता रहा हो और परिवार या दोस्तों से बातचीत कम कर रहा हो, तो यह संकेत हो सकते हैं कि वह अवसाद या गेमिंग डिस्आर्डर का शिकार हो रहा है। इस स्थिति में अभिभावकों को चाहिए कि बच्चे के साथ अधिक समय बिताएं, उसकी दिनचर्या पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।

डॉ. दीप्ती सिंह, मनोचिकित्सक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल 

बच्चों में मोबाइल की लत के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार 


आधुनिक परिवेश में बच्चों को खेलने की बजाय मोबाइल पकड़ा देना एक आम प्रवृत्ति बन चुकी है, जो भविष्य में गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्याओं का कारण बनती जा रही है। आजकल मोबाइल देखकर खाना खाते हैं,  दूध-पानी पिलाया जाता है, यानी बच्चे मोबाइल लेकर ही बड़े हो रहे हैं। बच्चा शुरुआत से ही गैजेट के प्रति आकर्षित हो रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह नशा माता-पिता खुद ही बच्चों में डाल रहे हैं। अभिभावकों को खुद पर नियंत्रण रखना होगा। यदि किसी कारणवश बच्चे को घर पर अकेला छोड़ना पड़े, तो बेहतर होगा कि घर में इंटरनेट की सुविधा सीमित कर दी जाए। इसके लिए वाई-फाई का पासवर्ड बदलना या स्पीड कम करने जैसे तकनीकी उपाय किए जा सकते हैं। साथ ही माता-पिता को चाहिए कि बच्चों की आदतों और दिनचर्या पर नजर रखें। यदि बच्चा लगातार मोबाइल में ही व्यस्त रहता है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। इसकी जगह उन्हें मैदान में खेलने और लोगों के संपर्क में रहने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, जिससे वे सामाजिक रूप से सक्रिय रहें और अवसाद से दूर रहें।

डॉ. देवाशीष शुक्ल, बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक एवं मानसिक रोग विशेषज्ञ 
    
 मोबाइल गेम्स से पड़ने वाले दुष्प्रभाव 

1- गेम्स ऐप पर्चेज करने को बच्चे माता-पिता की अनुमति के बिना पैसे खर्च कर देते हैं।
2- ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार होकर अपने माता-पिता के खाते खाली कर दिए।
3 - फ्री फायर व पब जैसे गेम्स खेलने से रोके जाने पर बढ़ती है आत्महत्या की प्रवृत्ति।
 4-  मोबाइल गेम से मना करने पर अपने हमला करने पर उतारू हो जाते हैं बच्चे।