Pilibhit: अब पीटीआर करेगा मिठाई की ब्रांडिंग, जंगल किनारे बसे समुदाय की बढ़ेगी आजीविका
सुनील यादव, पीलीभीत। देश-दुनिया में मशहूर पीलीभीत टाइगर रिजर्व अब मिठाई (डेजर्ट) की भी ब्रांडिंग करेगा। सुनने में जरूर कुछ अटपटा लग रहा होगा, मगर यह सच है। दरअसल पीलीभीत टाइगर रिजर्व विश्व प्रकृति निधि के सहयोग जंगल से सटे ग्रामीणों की आजीविका बढ़ाने में प्रयासरत हैं। इको विकास समितियों के माध्यम से जंगल से सटे तीन गांवों के ग्रामीण शहद उत्पादन, होमस्टे आदि कार्य में लगे हुए हैं।
वहीं अब लालपुर में भी इको विकास समिति का गठन करते ग्रामीणों के आय बढ़ाने के प्रयास शुरू किए गए हैं। लालपुर के ग्रामीण अपने यहां तैयार होने वाले शुद्ध मावा के पेड़ा मिठाई बनाने का काम कर रहे हैं। पीलीभीत टाइगर रिजर्व इस मिठाई की बिक्री के लिए प्लेटफार्म उपलब्ध कराने जा रहा है। ताकि ग्रामीणों की आय बढ़े ही, साथ ही दूर-दराज से आने वाले सैलानी स्थानीय पारंपरिक व्यंजन के बारे में भी जान सकें।
जनपद के जंगल को एक दशक पूर्व टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया था। टाइगर रिजर्व बनने के बाद जंगल से सटे गांवों के ग्रामीण, जिनकी आजीविका मात्र जंगल पर ही टिकी थी, उनके आगे रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। हालांकि विश्व प्रकृति निधि द्वारा पीलीभीत टाइगर के सहयोग से इन गांवों के ग्रामीणों को जंगल पर आश्रित न होना पड़े, इसको लेकर आरक्षित वन क्षेत्र के आसपास के ग्रामीणों को 41.99 लाख रुपये की लागत से 933 एलपीजी गैस सिलेंडर का वितरण किया गया था। महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए सिलाई मशीनें बांटी गई। वहीं विश्व प्रकृति निधि और पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से जंगल से सटे इन गांवों के विकास और रोजगार से जोड़ने इको विकास समितियों का गठन करते हुए कवायद शुरू की गई थी।
अब यह कवायद धीरे-धीरे धरातल पर उतर रही है। जंगल से सटे गांव पुरैना ताल्लुके महाराजपुर, टांडा छत्रपति और रम्पुरिया महोफ के ग्रामीण शहद उत्पादन का कार्य कर रहे हैं। ग्रामीणों द्वारा तैयार शहद को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी का टैग भी मिल चुका है। वहीं बराही जंगल से सटे सेल्हा गांव को टूरिज्म विलेज का रुप देते हुए यहां ग्रामीण होमस्टे के कार्य से जुड़ चुके हैं। जल्द ही जंगल से सटे बंगाली बाहुल्य इलाके के ग्रामीण जल्द ही जलकुंभी से तैयार उत्पादों को मार्केट में उतारने जा रहे हैं। इधर अब जंगल से सटे लालपुर में इको विकास समिति का गठन कर यहां के ग्रामीणों की आय बढ़ाने में मदद की जा रही है। पूर्व में यहां किसानों को निशुल्क गन्ने का बीज उपलब्ध कराया गया था। इधर अब लालपुर के ग्रामीण नई इबारत लिखने जा रहे हैं।
ईडीसी के सहयोग से शुद्ध मावे से तैयार हो रहा पेड़ा
पीलीभीत टाइगर रिजर्व और विश्व प्रकृति निधि अन्य संबंधित विभागों के समन्वय से गांव लालपुर के ग्रामीणों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत है। लालपुर इको विकास समिति (ईडीसी) के माध्यम से ग्रामीणों ने शुद्ध मावे से तैयार पेड़ा बनाने का कार्य शुरू किया है। दरअसल लालपुर जनपद में बड़े मावा उत्पादक गांवों में शुमार है। यहां का मावा जनपद समेत अन्य जनपदों में बिक्री किया जाता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व ने ग्रामीणों की मदद के लिए उन्हें पेड़े की बिक्री के लिए उचित प्लेटफार्म मुहैय्या कराने की योजना बनाई गई है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर मनीष सिंह के मुताबिक इसके लिए पीलीभीत टाइगर रिजर्व के इको टूरिज्म स्पॉट चूका बीच, सप्त सरोवर, महोफ पर्यटन गेट, मुस्तफाबाद पर्यटन गेट और बराही पर्यटन गेट पर पेड़े की बिक्री के लिए काउंटरों की व्यवस्था की गई है। पर्यटन सत्र के दौरान इन सभी स्थानों पर देश के कोने-कोने के अलावा विदेशों से सैलानी यहां पहुंचते हैं। ऐसे में पीलीभीत के पेड़े को अन्य जनपदों में भी एक पहचान मिलेगी। जल्द ही लालपुर ईडीसी के माध्यम से शुद्ध देशी भी उतारने का प्लान बनाया जा रहा है।
विश्व प्रकृति निधि पीटीआर के सहयोग से जंगल से सटे गांवों के विकास एवं वहां के लोगों को आजीविका में सहयोग देने की दिशा में कार्य कर रहा है। इसी कड़ी में लालपुर ईडीसी के माध्यम से तैयार पेड़े को बिक्री के लिए उतारा गया है। ताकि ग्रामीणों की आय में वृद्धि हो सके। जंगल से सटे अन्य गांवों को भी इस योजना से जोड़ने के लिए पीटीआर के सहयोग से इसकी रूपरेखा तैयार की जा रही है। - नरेश कुमार, वरिष्ठ परियोजना अधिकारी, विश्व प्रकृति निधि।
