सिख धर्म की सेवा और भक्ति
सुभाष नगर स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा का इतिहास सिख समाज की सेवा, त्याग और आस्था का जीवंत उदाहरण है। जिले में पहला गुरुद्वारा है जो सबसे पुराना है। यह गुरुद्वारा भारत विभाजन के पहले का है। भारत विभाजन से पहले (1940 के दशक में), जब सिख परिवारों का एक छोटा समुदाय बरेली में बसना शुरू हुआ, तो सुभाष नगर क्षेत्र में सिख संगत बहुत सीमित थी। उन दिनों संगत के पास न तो अपनी कोई स्थायी जगह थी और न ही भवन। आरंभ में एक छोटे से कमरे में गुरु ग्रंथ साहिब जी की स्थापना की गई थी। वहीं रोज़ाना सुबह-शाम का पाठ, कीर्तन, और लंगर सेवा शुरू हुई। यह छोटा-सा कमरा ही गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह साहिब लाइन पार का बीज साबित हुआ। समय के साथ जब सिख परिवारों की संख्या बढ़ी, तो संगत ने मिलकर गुरुद्वारा का विस्तार करने का निश्चय किया।
1950–60 के दशक में स्थानीय संगत के सहयोग और चंदे से पक्का भवन बनाया गया। धीरे-धीरे इसमें दीवान हॉल, लंगर हॉल, और संगत के ठहरने हेतु कमरों का निर्माण हुआ। नवनिर्माण के साथ गुरुद्वारे में गुरु नानक जयंती, वैशाखी, और अन्य प्रमुख गुरपुरब बड़ी श्रद्धा से मनाए जाने लगे। अब सुभाष नगर का यह गुरुद्वारा एक बृहद परिसर में विकसित हो चुका है। इसमें शानदार दीवान हॉल, आधुनिक लंगर हॉल, सेवादार आवास, और सिख इतिहास पर आधारित चित्र सजावट शामिल हैं। प्रतिदिन सुबह-शाम दीवान, कीर्तन दरबार, और निशुल्क लंगर सेवा जारी रहती है।

गुरूद्वारे के सामने बुक एजेंसी संचालक गुरूविंदर पाल सिंह छाबड़ा बताते हैं उन्होंने अपनी बाल्यकाल से युवावस्था में इस गुरूद्वारे को बढ़ते देखा है। बताते हैं कि पहले यह गुरूद्वारा लाइनपार के नाम से जाना जाता था। आजादी के समय से पहले का यह गुरूद्वारा आज भी अपनी परंपराओं को निर्वहन करता आ रहा है। अब भी यहां सुबह शाम लंगर लगता है। हर रोज शाम को तमाम फकीर गुरूद्वारे के लंगर के ही भरोसे जीवन यापन कर रहे हैं। स्टेशन के पास होने के कारण यहां यात्री भी आकर ठहरते हैं। यह निशुल्क सेवा है। एक कमरे से गुरूद्वारे का सफर हुआ था। अब यहां दस कमरे हैं। बड़े हाल हैं। यहां गुरूनानक के जन्मदिन पर प्रकाशपर्व का नगर कीर्तन इसी गुरुद्वारे से निकलता आ रहा है। वे बताते हैं कि गुरूद्वारे में हर धर्म के लोग आते हैं। यहां कोई भेदभाव नहीं है।
