शिव की त्रिविध ज्योति का प्रतीक

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Edited By Pradeep Kumar
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नाथ परंपरा की दूसरी प्रमुख कड़ी है — त्रिवटीनाथ मंदिर। यह मंदिर भी शिव के त्रिवेणी रूप का प्रतीक माना जाता है — ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिविध ज्योति यहाँ एक साथ विराजमान है। मंदिर का स्थापत्य अद्भुत है — ऊँचे शिखर पर लगा स्वर्ण कलश दूर से ही श्रद्धा जगाता है। सावन के महीने में जब कांवड़िए यहाँ गंगाजल चढ़ाने आते हैं, तो पूरा बरेली शहर भक्ति में डूब जाता है। 

यहाँ कोई एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब ‘हर हर महादेव’ की आवाज़ न गूंजे। भक्त सुबह से ही शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध और जल चढ़ाने आते हैं। यह मंदिर बरेली का आध्यात्मिक नाड़ी बिंदु है।” त्रिवतीनाथ मंदिर का परिसर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि समाज सेवा का केंद्र भी है। मंदिर के ट्रस्ट द्वारा निशुल्क भोजन, चिकित्सा शिविर और गौसेवा के कार्य नियमित रूप से किए जाते हैं। मंदिर के बगल में स्थित सरोवर में हर अमावस्या को हजारों श्रद्धालु स्नान करते हैं। यह वही सरोवर है जहाँ कभी योगी अपने ध्यान की शुरुआत करते थे।992

वनखंडीनाथ मंदिर
बरेली की प्राचीन धरती में अनेक ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक स्थल बसे हैं, उन्हीं में से एक अत्यंत प्रतिष्ठित शिवधाम है,वनखंडीनाथ मंदिर यह मंदिर बरेली के सबसे पुराने धार्मिक स्थलों में गिना जाता है ।  वनखंडी क्षेत्र के हृदय में स्थित यह मंदिर स्थानीय लोकपरंपरा, पुरातन आस्था और सदियों से प्रवाहित शिवभक्ति का अद्भुत केंद्र है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है, वह क्षेत्र प्राचीन समय में घने वनों से आच्छादित था। तब यह स्थान निर्जन, शांत और वन्य क्षेत्र का हिस्सा था, इसलिए इस स्थान को नाम मिला—“वनखंडीनाथ”, अर्थात् वनखंडों में विराजमान भगवान शिव।वनखंडीनाथ जी का आध्यात्मिक महत्व वनखंडीनाथ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि शिवभक्ति की जीवंत ऊर्जा का केंद्र है।  

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रामनगर जैन मंदिर
बरेली के आंवला में रामनगर में जैन मंदिर भी विश्व प्रसिद्ध है। रामनगर न केवल प्रदेश बल्कि देशभर के प्रसिद्ध जैन तीर्थों में से एक है। यह तीर्थ अपनी आध्यात्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्ता के कारण देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। भगवान पार्श्वनाथ की तपस्या स्थली रामनगर आंवला है। पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी में लेकिन उन्हें ज्ञान रामनगर में प्राप्त हुआ। यही वह स्थल है जहां पार्श्वनाथ को ज्ञान प्राप्त हुआ था।  यही पर पार्श्वनाथ को भगवान की उपाधि मिली। यहां भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा हरित पन्ने की है। विद्वानों का मत है कि यह प्रतिमा देव द्वारा स्थापित की गई है।  रामनगर जैन मंदिर की वास्तुकला अत्यंत भव्य और पारंपरिक है। मुख्य मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ हरितपन्ने की  प्रतिमा विराजमान है, जिसकी मुद्रा अत्यंत शांत और ध्यानमग्न है। मंदिर की दीवारों पर जैन पुराणों के दृश्य, तीर्थंकरों के जीवन प्रसंग और सूक्ष्म नक्काशी देखने योग्य हैं।

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धोपेश्वरनाथ
पांडवकालीन यह मंदिर सिद्धपीठ मंदिर है। यहां द्रोपदी के गुरु धूम्र ऋषि ने तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर शिव ने वरदान मांगने को कहा तो ऋषि ने जनता की मंगल कामना और कल्याण के लिए शिव से यहीं पर लिंग रूप में रहने का वरदान मांगा। वरदान स्वरूप शिव यहीं स्थापित हो गये। नाथ मंदिर में यह ऐसा मंदिर है जिसे अर्धनारीश्वर का रूप भी कहा जाता है।  मंदिर के महंत घनश्याम जी बताते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में धोपा मंदिर को अर्धनारीश्वर का रूप भी माना जाता है। इसका प्रमाण आज भी प्रचलित है। इसी मंदिर में भादों माह में आखिरी के दो गुरुवार को मेला आज भी लगता है। यह मेला धोपा मइया के नाम से प्रचलित है। जब आवागमन के साधन नहीं थे तो लोग एक दिन पहले आकर रुकते थे लेकिन अब लोग गुरुवार को आकर धोपा के सरोवर में स्नान करते हैं इससे चर्म रोग ठीक होते हैं। इसके बाद यहां स्थित रायसती मठिया में प्रसाद चढ़ाते हैं। नाथ मंदिरों में यह धोपेश्वर नाथ भी प्रसिद्ध और सिद्ध मंदिर है। यह इशान कोण में स्थित है। 

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