हाईकोर्ट : सहमति, विवाह और मातृत्व के बाद पोक्सो की कार्यवाही औचित्यहीन
प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को 2016 में दर्ज पोक्सो और दुष्कर्म के एक मामले की आपराधिक कार्यवाही यह कहते हुए रद्द कर दी कि आरोपी ने पीड़िता से “बहुत पहले” विवाह कर लिया था और दम्पति अब एक बच्चे के साथ सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। उक्त आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने वसीउल्लाह और दो अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए पारित किया।
कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि यदि कोई अपराध था... तो अब वह समाप्त हो चुका है। इस स्थिति में अभियोजन जारी रखने से न केवल न्यायिक समय की बर्बादी होगी, बल्कि एक स्थिर वैवाहिक जीवन को भी हानि पहुँचेगी। दोषसिद्धि की संभावना अब न केवल दूर है बल्कि धूमिल भी हो चुकी है। याचियों ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल वर्तमान याचिका के माध्यम से आईपीसी की विभिन्न धाराओं और पोक्सो की धारा 7/8 के तहत लंबित मुकदमे सहित संपूर्ण कार्यवाही निरस्त करने की मांग की थी। मामले के अनुसार जनवरी 2017 में पीड़िता के पिता ने एफआईआर दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उनकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाया गया। बरामदगी के बाद पीड़िता ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत अपने बयान में कहा कि वह बालिग है और स्वेच्छा से याची के साथ गई थी तथा उससे विवाह की इच्छा रखती है।
कोर्ट ने दर्ज किया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट (फरवरी 2017) के अनुसार घटना के समय पीड़िता की आयु लगभग 18 वर्ष थी। मुकदमे की लंबित अवस्था में दोनों ने विवाह किया और 2018 में उनके यहाँ पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद मामला मध्यस्थता केंद्र भेजा गया, जहाँ पीड़िता के पिता सहित सभी पक्षों ने समझौता कर लिया। हालांकि राज्य की ओर से इस पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया गया कि पीड़िता पोक्सो की परिभाषा के अनुसार ‘बच्ची’ थी और ऐसे मामलों में समझौता अपराध को समाप्त नहीं कर सकता, लेकिन कोर्ट ने उपरोक्त तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन जारी रखने से यह ‘खुशहाल परिवार’ टूट सकता है, जो न्याय की भावना के प्रतिकूल होगा। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विवाह और बाद की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही रद्द की गई थी, जिससे परिवार को “अनुचित उत्पीड़न” से बचाया जा सके। अंत में इन आधारों पर उच्च न्यायालय ने आरोप पत्र, संज्ञान आदेश और सत्र परीक्षण की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करते हुए स्वीकार किया कि ऐसी परिस्थितियों को देखकर न्यायालय आँखें बंद नहीं कर सकता है।
