थारू-थाली, शिल्पग्राम और नदी सफारी का होगा विस्तार, पर्यटकों को दुधवा और कतर्नियाघाट में मिलेगा अनोखा अनुभव
थारू संस्कृति समेत स्थानीय समुदाय को रोजगार का लाभ
लखनऊ, अमृत विचार: इको टूरिज्म विकास बोर्ड की बैठक में प्रदेश को इको-टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किए गए। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य और तराई क्षेत्र को संस्कृति, प्रकृति और साहसिक पर्यटन का प्रमुख गंतव्य बनाने पर विस्तृत चर्चा हुई। थारू जनजाति की सांस्कृतिक पहचान, स्थानीय खानपान, हस्तशिल्प और वन्यजीव अनुभवों को राज्य के नए पर्यटन मॉडल की धुरी बनाया जा रहा है।
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य में गेरुआ नदी पर चलने वाली बोट सफारी को पर्यटक काफी पसंद कर रहे हैं। वर्तमान में यहां दो बोट संचालित होती हैं, लेकिन पर्यटकों की बढ़ती मांग को देखते हुए बोर्ड ने दो अतिरिक्त बोट शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। इससे सफारी की क्षमता दोगुनी हो जाएगी। बोर्ड ने सुझाव दिया कि नई बोटों में पर्यावरण-अनुकूल तकनीक का इस्तेमाल हो, ताकि नदी तट की पारिस्थितिकी पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
दुधवा और कतर्नियाघाट के तराई क्षेत्रों में रहने वाली थारू जनजाति की संस्कृति को पर्यटन से सीधे जोड़ने के लिए बोर्ड ने ‘अनुभव–थारू संस्कृति’ योजना का प्रस्ताव किया है। इस योजना का उद्देश्य पर्यटकों को थारू समुदाय की जीवनशैली, परंपराओं, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और खानपान का प्राकृतिक और अनूठा अनुभव देना है। इसी क्रम में ‘थारू थाली’ को भी विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पारंपरिक भोजन में स्थानीय अनाज, जड़ी-बूटी और प्राकृतिक मसालों से तैयार व्यंजन शामिल होंगे। होटलों और रिसॉर्ट संचालकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने मेन्यू में थारू थाली को शामिल करें। साथ ही महिलाओं और युवाओं के लिए खानपान व आतिथ्य प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की योजना है, जिससे थारू समुदाय के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।
चंदन चौकी शिल्पग्राम का पुनर्विकास
बैठक में प्रस्तुत एक अन्य प्रस्ताव में दुधवा क्षेत्र स्थित चंदन चौकी शिल्पग्राम के पुनर्विकास पर जोर दिया गया है। जनजातीय विकास विभाग द्वारा निर्मित यह शिल्पग्राम वर्तमान में बंद पड़ा है। बोर्ड ने सुझाव दिया कि इसे हस्तशिल्प प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कार्यशालाओं के एक सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। पर्यटन विभाग, इको-टूरिज्म बोर्ड या पर्यटन निगम इसे निजी साझेदारी के तहत संचालित कर सकता है। इससे पर्यटन सुविधाओं में वृद्धि होगी और क्षेत्र में सतत पर्यटन को प्रोत्साहन मिलेगा।
इको-टूरिज्म का नया मॉडल बनाने की तैयारी
इको-टूरिज्म बोर्ड की इन पहलों से न सिर्फ पर्यटकों को जंगल, नदी और जनजातीय संस्कृति का एकीकृत अनुभव मिलेगा, बल्कि थारू समुदाय के आर्थिक-सामाजिक उत्थान को भी नई दिशा मिलेगी। इन योजनाओं के क्रियान्वयन से दुधवा और कतर्नियाघाट को पर्यावरणीय पर्यटन का मजबूत केंद्र बनाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उत्तर प्रदेश को इको-टूरिज्म हब बनाने की परिकल्पना को बड़ा बल मिलेगा।
