मेरा शहर मेरी प्रेरणा : खानकाह-ए-नियाजिया...सूफी शिक्षा और आध्यात्मिक विकास का केंद्र
बरेली की खानकाह-ए-नियाजिया को दुनिया में सूफी शिक्षा और आध्यात्मिक विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है। खानकाह में मुस्लिमों के अलावा हिंदू भी बड़ी संख्या में आते हैं, इस तरह यह खानकाह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी है। यहां किसी से नहीं पूछा जाता है कि आप किस धर्म-जाति के हैं या कहां से आए हैं। दरगाह मोहब्बत, इंसानियत, सुकून और खिदमत का पैगाम देती है। सूफी संगीत से जुड़े तमाम नामचीन फनकारों के खास जुड़ाव ने भी खानकाह को अलग पहचान दी है।

हजरत शाह नियाज अहमद के सिलसिले से वजूद में आई इस खानकाह का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना है। सिलसिला-ए-नियाजिया किताब में खानकाह के उस शुरुआती दौर का जिक्र किया गया है, जब हजरत शाह नियाज अहमद बरेली आए थे। उस वक्त बरेली में हाफिज रहमत खां हाकिम थे। हजरत शाह नियाज अहमद ने बिहारीपुर में एक मकान किराये पर लिया और करीब की मस्जिद में देहली की तर्ज पर पढ़ाने लगे। बरेली आने से पहले उनकी शोहरत यहां पहुंच चुकी थी। सैकड़ों लोग उनके दर पर हाजिरी देने लगे। वह अवाम की दिक्कतें हल करने लगे। कुछ ही समय में खानकाह से कौम-मिल्लत, जाति-धर्म से अलग मोहब्बत-नेकी का संदेश निकलने लगा। यह कौमी एकता का घर बन गया।

आज जिस जगह हजरत शाह नियाज अहमद की खानकाह है, उसका नाम खोजी मोहल्ला था जो अब बदलकर ख्वाजा कुतुब हो गया है। यहीं उन्होंने खानकाह और मकान बनाया। देश-दुनिया के लोग यहां आने लगे। खानकाह की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि यहां ख्वाजा गरीब नवाज के रूहानी जानशीन हजरत शाह नियाज बेनियाज की दरगाह भी है। खानकाह में हर साल मन्नतों के चिराग रोशन करने की पुरानी परंपरा है। इसमें हिंदू-मुस्लिम समेत सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं। जश्न-ए-चिरागा में शामिल होने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं। यहां हर रोज अलग-अलग धर्मों के सैकड़ों अकीदतमंद हाजिरी लगाते हैं। खानकाह के मौजूदा सज्जानशीन हजरत मेहंदी मियां ने पुरानी रवायतों को बरकरार रखा है।

हजरत के कलाम पढ़कर शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचे कई फनकार
खानकाह-ए-नियाजिया से तमाम नामचीन फनकार का जुड़ाव है। काफी हर साल यहां हाजिरी लगाने भी आते हैं। खानकाह से बड़े-बड़े संगीतकारों, शायरों और कव्वालों को भी सम्मान हासिल हुआ। शास्त्रीय संगीत में वर्ष 1957 में पद्म भूषण सम्मान पाने वाले रामपुर-सहसवान घराने के उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां खानकाह के मुरीद थे। खानकाह के मुरीदों में इसके अलावा उस्ताद राशिद खां, पंडित बिरजू महाराज, सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खां जैसे कई और बड़े फनकारों का नाम शामिल हैं, जिन्हें पद्म भूषण मिल चुका है। तबदला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन, विलायत खां, संगीतकारों में एआर रहमान, सलीम सुलेमान, मशहूर शायर वसीम बरेलवी, मुन्नबराना, राहत इंदौरी, कव्वालों में उस्ताद मुराबारक, जाफर बदायूंनी, अजीज नाजा, साबरी ब्रदर्स जायपुर वालों का भी किसी वक्त में खानकाह से जुड़ाव रहा है। हजरत शाह नियाज अहमद की शायरी की कोई मिसाल नहीं है। उन्होंने शायरी के साथ अलग-अलग विषयों पर तमाम किताबें लिखीं। रामपुर निवासी मशहूर कव्वाल शाहिद शमी नियाजी बताते हैं कि गुलाम फरीद साबरी, उस्ताद नुसरत फतेह अली, पाकिस्तानी गायक आबिदा परवीन समेत तमाम फनकारों ने हजरत शाह नियाज अहमद के कलाम पढ़कर शोहरत पाई। लगभग सभी बड़े फनकार यहां अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। शमी नियाजी भी 32 मुल्कों में अपनी कव्वाली का जादू बिखेर चुके हैं। कई फिल्मों में आवाज दे चुके हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। वह भी खानकाह से जुड़े हैं।
शाह नियाज अहमद की गजल
इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो हो,
ऐश-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया जो हो सो हो।
अक़्ल के मदरसे से हो इश्क़ के मय-कदा में आ,
जाम-ए-फ़ना व बे-ख़ुदी अब तो पिया जो हो सो हो।
लाग की आग लग उठी पम्बा तरह सा जल गया,
रख़्त-ए-वजूद जान-ओ-तन कुछ न बचा जो हो सो हो।
हिज्र की सब मुसीबतें अर्ज़ कीं उस के रू-ब-रू,
नाज़-ओ-अदा से मुस्कुरा कहने लगा जो हो सो हो।
दुनिया के नेक-ओ-बद से काम हम को ‘नियाज़’ कुछ नहीं,
आप से जो गुज़र गया फिर उसे क्या जो हो सो हो।


शाहरुख की मां चाहती थीं दिलीप कुमार की तरह सफल हो बेटा
खानकाह-ए-नियाजिया के खानवादा मो. रजा राजी नियाजी कहते हैं कि खानकाह में इंसानियत की भलाई के लिए काम किया जाता है। यहां के बुजुर्ग खुले विचारों के हैं। जर्मन, कनाडा, अमेरिका समेत तमाम देशों के नुमाइंदे यहां आते रहते हैं। देश-दुनिया के लोगों का यहां से जुड़ाव है। इनमें फिल्मी हस्तियां और बड़े फनकार भी शामिल हैं। बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान की मां भी यहां की मुरीद थीं। वह चाहती थीं कि उनका बेटा दिलीप कुमार की तरह सफल हो और बड़े मुकाम पर पहुंचे।
