मेरा शहर मेरी प्रेरणा : वीरेंद्र कुमार सिंह बरेली की योग्यतम संतान राधेश्याम कथावाचक को मुख्यधारा में लाए

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली शहर अपने अस्तित्व के साथ ही वाणिज्य का प्रमुख केंद्र बना रहा। सल्तनत काल के बाद मुगल आए, उन्होंने भी बड़ा व्यापारिक केंद्र होने के नाते बरेली पर फोकस रखा। अंग्रेजों ने तो प्रशासनिक व्यवस्था के संचालन के लिए बरेली को ही केंद्र बना लिया। यहां तैनात रहे तमाम अधिकारियों ने शहर के विकास पर ज्यादा जोर दिया। इन सबके बीच जिले में तैनात रहे कुछ अफसरों ने लीक से हटकर काम किया और उनकी यादें लोगों के दिलो-दिमाग पर कायम हो गईं। 

ऐसे अफसरों की कार्यशैली की प्रशंसा करते हैं और नजीर के तौर पर पेश भी करते हैं। बरेलियंस के दिलो-दिमाग पर छाए अफसरों की फेहरिस्त लंबी है। इनमें जिन अफसरों की यादें लोगों के जेहन में लंबे समय से पैबस्त हैं, उनमें आईएएस अफसरों में दीपक सिंघल, रमारमण, नितीश कुमार, देशदीपक वर्मा, टी. वेंकटेश, वीरेंद्र कुमार सिंह, केबी अग्रवाल, संजय भूस रेड्डी, सीताराम मीणा, अनिल गर्ग, पुलिस अफसरों में सीडी कैंथ, उदयन परमार, वीके मौर्य, आनंद स्वरूप, गुरु वचन लाल, पीसीएस अफसरों में बाबा हरदेव सिंह,मंजुल जोशी, दिनेश कुमार सिंह  शामिल हैं।

 कलेक्ट्रेट के प्रशासनिक अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके बनवारी लाल अरोड़ा बताते हैं कि बरेली में तैनात रहे सभी पुलिस और प्रशासनिक अफसर अपनी काबिलियत में बेमिसाल थे, लेकिन कई अफसरों ने अपनी कार्यशैली के जरिये लोगों को अपना मुरीद बना लिया। यही कारण है कि लोग आज भी उन्हें बड़े ही प्यार और अदब से याद करते हैं। अमृत विचार की मेरा शहर -मेरी प्रेरणा सीरीज में कुछ खास अफसरों के बारे में सुनील सिंह की विशेष रिपोर्ट ...

राधेश्याम कथावाचक के जरिये बना दिया साहित्यिक माहौल
रिटायर्ड आईएएस अफसर वीरेंद्र कुमार सिंह वर्ष 2018-19 में बरेली के कलेक्टर रहे। प्रशासनिक कार्यों के बीच बरेली में साहित्यिक माहौल बनाने में उन्होंने बड़ा योगदान किया, जो कि एक प्रशासनिक अफसर की भूमिका के रूप में बेहद अलग था। वह बताते हैं कि जब इस शहर में आए और उन्होंने लोगों से बात शुरू की तब पता चला कि बरेली शहर की योग्यतम संतान राधेश्याम कथावाचक को लोग विस्मृत कर रहे हैं। राधेश्याम रामायण देश के तमाम हिस्सों में आज भी प्रचलित है। अवधी रामलीला का मुख्य आधार ही राधेश्याम रामायण है। इसके अलावा पंजाब से लेकर लाहौर तक उनकी रामायण पढ़ी और मंचित की जाती थी।

यही नहीं अपनी विशिष्ट शैली के कारण उनके लिखे नाटकों का उत्तर भारत में जबरदस्त आकर्षण था। वह कहते हैं कि इस बात से उन्हें बहुत आघात लगा कि बरेली शहर के ही लोग राधेश्याम कथावाचक को भूलते जा रहे हैं। वह कहते हैं कि इसके बाद तय किया कि बरेली की योग्यतम संतान राधेश्याम कथावाचक को एक बार फिर जनमानस के बीच में स्थापित करेंगे। इसके लिए शहर के प्रमुख रंगकर्मियों और साहित्यकारों को जोड़ा। शहर के प्रबुध लोगों को योजना पसंद आई और पहली संजय कम्युनिटी हाल में उनके जन्मदिन 25 नवंबर पर सप्ताह भर का पंडित राधेश्याम कथावाचक नाट्य उत्सव का आयोजन किया गया। इसमें पंडित जी के नाटकों का मंचन किया गया। शहर के गणमान्य लोग, प्रबुद्ध जन और आम लोग पहुंचे। कार्यक्रम के बाद से पंडित जी के लेखन को लेकर शहर में सकारात्मक माहौल बना। 

वह बताते हैं कि उनके कार्यकाल में दो बार आयोजन हुआ। उनके जाने के बाद शहर के लोगों इस आयोजन की कमान संभाल ली। तीसरा आयोजन फ्यूचर यूनिवर्सिटी में किया गया। इस आयोजन में वह लखनऊ से आकर शामिल हुए थे। शहर के वरिष्ठ पत्रकार रणजीत पांचाले समेत अन्य लोग आयोजन की कमान संभाले हुए हैं। रणजीत पांचाले बताते हैं कि पिछले दो सालों से इस आयोजन का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। अब उनके नाटकों के मंचन से ज्यादा बौद्धिक पक्ष पर चर्चा पर फोकस किया जाता है। हालांकि उनके नाटकों का मंचन भी जारी है। अभी कुछ समय पहले उनकी पुण्यतिथि पर शहर में आयोजित नाट्य महोत्सव में राधेश्याम कथावाचक के नाटकों का मंचन किया गया है। उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाट्य उत्सव का आयोजन कराया था।

जिला लाइब्रेरी में स्थानीय रचनाकारों की बनवाई दीर्घा
बकौल वीरेंद्र कुमार सिंह राधेश्याम कथावाचक के नाटकों का आकर्षण महान उपान्यासकार प्रेमचंद के उपन्यास गबन को पढ़कर समझा जा सकता है। गबन उपन्यास का नायक गबन करने के बाद पुलिस की गिरफ्त से बचने के लिए कलकत्ता में जाकर छिप जाता है। अपनी फरारी के दौरान उसे पता चलता है कि कलकत्ता शहर में राधेश्याम कथावाचक के नाटक का मंचन होने जा रहा है। यह जानते हुए कि पुलिस उसकी गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत है, लेकिन उपन्यास का नायक अपने छिपे हुए स्थान से बाहर निकल कर नाटक देखने के लिए पहुंच जाता है। रणजीत पांचाले कहते हैं कि वीरेंद्र कुमार सिंह का योगदान यहीं नहीं रुक जाता है। उन्होंने इस शहर के प्रमुख साहित्यकारों प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी से लेकर प्रबुद्ध आलोचक मधुरेश तक की रचनाओं को संकलित कराकर राजकीय पुस्तकाल में अलग दीर्घा बनवाई थी। इस दीर्घा में बरेली के सभी साहित्यकारों की रचनाओं को स्थान दिया गया था। जिला जेल में प्रेमचंद का साहित्य रखवाया गया था।

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