मेरा शहर मेरी प्रेरणा : Allexandar izat-पहाड़ पर ट्रेन चढ़ाकर इज्जत नगर के रूप में शहर का हिस्सा हो गए

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Edited By Amrit Vichar
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अंग्रेजी शासनकाल में बरेली व्यापार के साथ ही शासन प्रशासन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। अंग्रेजों ने आसपास के क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य बरकरार रखने के साथ कारोबार के लिए द्रुतगामी यातायात के साधनों का विकास शुरू किया। अंग्रेजों ने 1857 में पहाड़ों को मैदानी हिस्से से जोड़ने की परियोजना पर काम शुरू हुआ। ब्रिटिश रेलवे अफसर एलेक्जैंडर इज्जत ने 1883 में परियोजना की कमान संभाली। उन्होंने बरेली-काठगोदाम रेलवे ट्रैक काम शुरू किया। इसके साथ ही बरेली से लखनऊ के लिए रेलवे लाइन बिछा दी। 

एलेक्जेंडर इज्जत की तीन पीढ़ियों ने 31 साल की रेलवे की सेवा
अलेक्जेंडर इज्जत के नाम पर वाराणसी-प्रयागराज रेलवे लाइन पर प्रयागराज में गंगा नदी पर बने पुराने पुल को भी इज्जत पुल कहा जाता था। इस पुल के पहले कमांडर अलेक्जेंडर इज्जत थे। उन्होंने 1883 से 1904 तक बीएनडब्ल्यूआर के दूसरे एजेंट के रूप में कार्य किया। इसी दौरान सोनपुर से चोपन, सीवान, गोरखपुर होते हुए लखनऊ तक बीएनडब्ल्यूआर की मुख्य लाइन बिछाई गई थी। एलेक्जेंडर इज्जत के पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल डब्ल्यू.आर. 1920 से लेकर 1927 तक बीएनडब्ल्यूआर के एजेंट नियुक्त रहे। उनके पुत्र सर जे. रेनी इज्जत 1941 से 1944 तक बीएनडब्ल्यूआर के एजेंट रहे।  पिता-पुत्र-पौत्र की इस तिकड़ी ने 31 वर्षों तक इस रेलवे के भविष्य को आकार दिया, जो पूर्वोत्तर रेलवे के गठन के महत्वपूर्ण वर्ष थे।

इज्जत स्टेशन से रेलवे डिवीजन बनने की कहानी
बरेली स्थित इज्जत नगर रेलवे स्टेशन की स्थापना 1875 में की गई थी। नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन से जुड़े बसंत चतुर्वेदी कहते हैं कि अलेक्जेंडर इज्जत की तीन पीढ़ियों ने पहाड़ पर ट्रेन चढ़ाने के लिए कार्य किया। अलेक्जेंडर इज्जत के काम के सम्मान में, स्टेशन का नाम इज्जत रेलवे स्टेशन रखा गया था। लोगों ने धीरे-धीरे इसे इज्जत नगर कहना शुरू कर दिया और यही नाम रेलवे रिकॉर्ड में भी दर्ज हो गया है। आजादी के बाद 14 अप्रैल 1952 को इज्जत नगर को पूर्वोत्तर रेलवे का डिवीजन बना दिया गया।

 

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