पौराणिक कथाः आखिर कैसे हुई नारियल की उत्पत्ति

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Published By Muskan Dixit
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हिन्दू धर्म में नारियल का विशेष धार्मिक महत्व है। लगभग हर पूजा-पाठ, यज्ञ और शुभ संस्कार में नारियल का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है। इसे पवित्रता, पूर्णता और शुभता का प्रतीक समझा जाता है। नारियल से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार इसका पृथ्वी पर अवतरण महर्षि विश्वामित्र द्वारा कराया गया था। यह कथा प्राचीन काल के प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा सत्यव्रत से संबंधित है। राजा सत्यव्रत ईश्वर में गहरी आस्था रखते थे। उनके पास राज्य, वैभव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनके मन में एक विशेष इच्छा थी- वे जीवित अवस्था में पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जाना चाहते थे। स्वर्गलोक की अलौकिक सुंदरता उन्हें अत्यंत आकर्षित करती थी, परंतु वहां पहुंचने का मार्ग उन्हें ज्ञात नहीं था।

एक समय महर्षि विश्वामित्र तपस्या के लिए अपने आश्रम से दूर चले गए। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में अकाल पड़ गया और उनका परिवार कठिन परिस्थितियों में जीवनयापन करने लगा। इस संकट के समय राजा सत्यव्रत ने महर्षि के परिवार की सहायता की और उनकी देख-रेख का दायित्व निभाया। जब महर्षि विश्वामित्र तपस्या से लौटे, तो उन्हें अपने परिवार से राजा के इस उपकार की जानकारी मिली। कृतज्ञ होकर महर्षि विश्वामित्र राजा के दरबार पहुंचे और उन्हें वर मांगने का अवसर दिया। राजा ने विनम्रतापूर्वक अपनी इच्छा व्यक्त की कि वे स्वर्गलोक जाना चाहते हैं। राजा के उपकार को स्मरण करते हुए महर्षि ने अपने तपोबल से एक मार्ग तैयार किया, जो स्वर्गलोक की ओर जाता था। राजा उस मार्ग से स्वर्ग की ओर बढ़े, किंतु जैसे ही वे स्वर्ग के समीप पहुंचे, देवराज इन्द्र ने उन्हें वहां प्रवेश करने से रोकते हुए पृथ्वी की ओर धकेल दिया। दुखी राजा ने यह घटना महर्षि को बताई। इसके बाद देवताओं और महर्षि विश्वामित्र के बीच विचार-विमर्श हुआ और एक समाधान निकाला गया।

निर्णय हुआ कि राजा सत्यव्रत के लिए पृथ्वी और स्वर्ग के बीच एक नया स्वर्गलोक बनाया जाएगा। उसे स्थिर रखने के लिए महर्षि ने उसके नीचे एक विशाल खंभे का निर्माण किया। मान्यता है कि समय के साथ यह खंभा एक ऊंचे वृक्ष में बदल गया और राजा सत्यव्रत का सिर फल का रूप धारण कर गया। यही वृक्ष नारियल का पेड़ और वह फल नारियल कहलाया। इस कथा के अनुसार राजा सत्यव्रत न तो पूर्ण रूप से पृथ्वी के रहे और न ही स्वर्ग के, बल्कि दोनों लोकों के बीच स्थित रहे। इसी कारण नारियल को हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र और पूजनीय स्थान प्राप्त है।

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