लव बर्ड्स: संघर्षों के बीच पनपा विश्वास

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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हमारी पहली मुलाकात वर्ष 2009 में मेरी बुआ जी की बेटी की शादी में हुई थी। उस दिन वैशाली ने काले रंग की साड़ी पहन रखी थी। जैसे ही मैंने उन्हें देखा, उसी क्षण मेरे मन में उनके प्रति एकतरफा प्रेम जाग उठा। तभी मैंने मन ही मन यह निर्णय कर लिया कि यही वह लड़की है, जो विवाह के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। 

शादी के पांच-छह दिन बाद हम पहली बार दिल्ली कनॉट प्लेस स्थित मैकडोनाल्ड्स में मिले। मुलाकात होते ही मैंने बिना किसी भूमिका के वैशाली से विवाह का प्रस्ताव रख दिया। यह सुनकर उन्होंने कहा कि यह संभव नहीं होगा, क्योंकि हमारे दोनों परिवार इस रिश्ते के लिए सहमत नहीं होंगी। उनके ऐसा कहने के बाद मेरा अगला प्रश्न था-“क्या तुम मेरा साथ दोगी?” उन्होंने ‘हां’ कहा। तब मैंने उनसे कहा कि फिर सब कुछ भगवान पर छोड़ देते हैं, सब ठीक हो जाएगा।

इसके बाद के कुछ वर्ष हमारे लिए काफी संघर्षपूर्ण रहे। वर्ष 2011 में वैशाली के पिता का निधन हो गया। इसके दो वर्ष बाद मेरे पिता भी हमें छोड़कर चले गए। इन घटनाओं के बाद दोनों परिवारों को मनाना और भी कठिन हो गया। उस समय मैं आर्थिक रूप से भी स्थिर नहीं था और दिल्ली में मेरा अपना घर भी नहीं था, जिसके कारण वैशाली का परिवार इस रिश्ते को लेकर आश्वस्त नहीं था, लेकिन वैशाली का हर परिस्थिति में मेरे साथ खड़े रहना ही मेरे लिए सबसे बड़ा संबल था।

वर्ष 2012 में मैंने दिल्ली में अपना घर लिया। दोनों परिवारों के कड़े विरोध और अनेक कठिनाइयों के बाद अंततः वह शुभ घड़ी भी आ गई और 18 नवंबर 2013 को हम विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। तब से लेकर आज तक हम दोनों हर सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ हैं।

वर्ष 2016 में हमारे यहां एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसने हमारी खुशियों को और भी पूर्ण कर दिया। अब तक के इन बारह वर्षों के सफर में अनेक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन हर भावनात्मक और आर्थिक संकट के समय वैशाली ने मेरा मजबूती से साथ दिया। आज मैं अपने परिवार के साथ बेहद संतुष्ट और खुश हूं।-राम मोहन  और वैशाली