लखनऊ : फर्जीवाड़ा कर 89 मदरसों ने हासिल की मान्यता, दर्ज होगी एफआईआर

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Edited By Amrit Vichar
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लखनऊ, अमृत विचार : मदरसा बोर्ड में फर्जीवाड़ा कर मान्यता हासिल करने का खेला बदस्तूर जारी है। हाल ही में शासन द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने मिर्जापुर के 143 मदरसों के मान्यता की जांच की। जिसमें 89 ने फर्जीवाड़ा कर मान्यता की मंजूरी करा ली। इन मदरसों ने मान्यता के साथ ही सरकारी धन का भी खुलेआम उपभोग किया। इस बड़े घोटाले में एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट शासन को भेजी है। जिसमें अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारी व कर्मचारी के अलावा 42 मदरसा प्रबंधकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की सिफारिश की है।

मिर्जापुर जिले में संचालित 143 मदरसों की जांच स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने की। जांच के दौरान 89 मदरसों की मंजूरी में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। इसके साथ ही मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत नियुक्त शिक्षकों को बिना किसी भौतिक या दस्तावेजी सत्यापन के अवैध रूप से मानदेय दिए जाने के भी ठोस सबूत मिले हैं।

एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले में तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों, कर्मचारियों और मदरसा प्रबंधकों की मिलीभगत सामने आई है। रिपोर्ट में नीरज कुमार अग्रवाल, (वर्तमान जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, सिद्धार्थनगर), विष्णु कुमार मिश्रा (वर्तमान जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, सोनभद्र), विजय प्रताप यादव (वर्तमान उप निदेशक, आजमगढ़), शिव शंकर मालवीय (सेवानिवृत्त क्लर्क), राजेश गिरी (कंप्यूटर ऑपरेटर) और 42 मदरसा प्रबंधकों को दोषी ठहराया गया है। एसआईटी ने इन सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की सिफारिश की है।

11.73 करोड़ रुपये के गबन के मिले साक्ष्य

जांच में यह भी सामने आया कि अधिकारियों और कर्मचारियों ने मदरसा प्रबंधकों के साथ मिलकर सरकारी आदेशों और उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 का उल्लंघन करते हुए मदरसों को अस्थायी मान्यता दी। इसके बाद बिना उचित जांच-पड़ताल के शिक्षकों के वेतन के लिए बजट की मांग की गई और कई ऐसे मदरसों को भी भुगतान कर दिया गया, जिनके लिए बजट स्वीकृत नहीं था। इस प्रक्रिया में करीब 11.73 करोड़ रुपये के सरकारी धन के गबन के साक्ष्य मिले हैं। वहीं, तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी विनोद कुमार जायसवाल (वर्तमान में उप निदेशक, गोरखपुर) पर वर्ष 2017 में बिना किसी सत्यापन के डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए मदरसों को लॉक करने और लगभग 1.94 करोड़ रुपये के भुगतान का आरोप है। उनके खिलाफ लापरवाही और शिथिलता को लेकर विभागीय जांच पहले से ही चल रही है, हालांकि एसआईटी ने उनके खिलाफ एफआईआर की सिफारिश नहीं की है।

जून 2020 में एसआईटी जांच का हुआ था निर्णय

26 जून 2020 को अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक की सिफारिश पर 2 नवंबर 2020 को इस प्रकरण की जांच एसआईटी से कराने का निर्णय लिया गया था। जांच के दौरान दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की पुष्टि हुई। रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस मामले में राज्य स्तर पर सख्त कानूनी और विभागीय कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।

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