अनोखी परंपराएं: मेघालय का ‘व्हिसलिंग विलेज’- जहां नाम नहीं, सीटी है पहचान
पूर्वोत्तर भारत की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा मेघालय का एक छोटा-सा गांव कॉन्थोंग अपनी अनोखी परंपरा के कारण पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यहां लोग एक-दूसरे को नाम से नहीं, बल्कि सीटी की खास धुन से बुलाते हैं। यह कोई लोककथा या कल्पना नहीं, बल्कि गांव की जीवित और सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान है। इसी वजह से कॉन्थोंग को ‘व्हिसलिंग विलेज’ कहा जाता है।
मेघालय कॉन्थोंग गांव में हर व्यक्ति की सीटी अलग होती है और वही उसकी पहचान बन जाती है। परंपरा के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद उसकी मां उसे एक विशेष सीटी की धुन देती है। यही धुन उसके नाम का स्थान ले लेती है और जीवनभर उसके साथ रहती है। समय के साथ यह सीटी परिवार, पड़ोस और पूरे गांव को याद हो जाती है, जिससे बिना देखे ही पहचान हो जाती है कि कौन बुला रहा है। यह अनोखी परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से सिखाई जाती रही है।
कॉन्थोंग की सीटी भाषा सिर्फ संवाद का साधन नहीं, बल्कि सामुदायिक जुड़ाव का प्रतीक भी है। यहां के लोग मानते हैं कि यह परंपरा उन्हें प्रकृति के करीब रखती है और आपसी संबंधों को मजबूत बनाती है। आधुनिक तकनीक और मोबाइल फोन के दौर में भी गांव के लोग इस विरासत को संजोए हुए हैं, जो उनकी स्वदेशी पहचान को दर्शाती है।
कॉन्थोंग की भौगोलिक संरचना इसकी इस परंपरा की सबसे बड़ी वजह है। ऊंची पहाड़ियां, गहरी घाटियां और घना जंगल सामान्य आवाजों को दूर तक पहुंचने नहीं देते। ऐसे वातावरण में बातचीत के लिए सीटी सबसे प्रभावी माध्यम बन गई। इसकी तीखी और स्पष्ट ध्वनि बिना बाधा के पहाड़ों के आर-पार चली जाती है। खेतों में काम करते हुए, जंगल में लकड़ी काटते समय या दूर किसी ढलान पर मौजूद व्यक्ति को बुलाना हो, एक सीटी ही पर्याप्त होती है।
आज यह अनूठा ‘व्हिसलिंग कल्चर’ कॉन्थोंग को वैश्विक पहचान दिला रहा है। देश-विदेश से पर्यटक इस परंपरा को देखने और सुनने यहां आते हैं। वे सीटी की धुनों के पीछे छिपी भाषा और भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं। कॉन्थोंग इस तरह संस्कृति, प्रकृति और परंपरा का सुंदर संगम बनकर भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।
