पौराणिक कथा: ब्राह्मण का शाप और कर्ण की नियति
द्वापरयुग की बात है। सूर्यपुत्र कर्ण अपने पराक्रम और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन वे शिकार के उद्देश्य से घने वन में निकले। प्राचीन काल में राजा और क्षत्रिय प्रायः हिंसक पशुओं का शिकार करते थे, ताकि वे नगरों और ग्रामों में प्रवेश कर जन-धन की हानि न कर सकें। इसी कर्तव्यभाव से प्रेरित होकर कर्ण भी जंगल में विचरण कर रहे थे।
वन के भीतर घूमते हुए कर्ण को झाड़ियों के पीछे किसी हिंसक पशु की आहट प्रतीत हुई। बिना लक्ष्य को भली-भांति देखे और विचार किए, उन्होंने तुरंत अपना धनुष उठाया और बाण छोड़ दिया। दुर्भाग्यवश वहां कोई क्रूर पशु नहीं, बल्कि एक ब्राह्मण की निरपराध गाय शांतिपूर्वक घास चर रही थी।
बाण लगते ही गाय कुछ क्षणों में धराशायी हो गई और उसके प्राण निकल गए। यह दृश्य देखकर वह ब्राह्मण व्याकुल हो उठा। अपनी प्रिय गाय को मृत देखकर वह शोक और क्रोध से भर गया। वह वहीं बैठकर विलाप करने लगा। जब कर्ण को अपने कार्य का भयानक परिणाम ज्ञात हुआ, तो उनका हृदय भी पीड़ा से भर उठा। वे ब्राह्मण के पास गए, विनम्र होकर क्षमा याचना की और सांत्वना देने लगे।
परंतु ब्राह्मण का दुःख क्रोध में बदल चुका था। उसने कर्ण को दूर हटाते हुए कहा- “हे शक्तिमान कर्ण! अपने बल और वैभव के अहंकार में क्या तू यह भी भूल गया कि बिना लक्ष्य निश्चित किए शस्त्र नहीं चलाया जाता? तूने मेरी निरीह गाय की हत्या कर दी और अब क्षमा मांगता है। क्या तेरी क्षमा मेरी गाय को जीवित कर सकती है? मेरे घर बंधा उसका बछड़ा, जो अब भूख और पीड़ा से अपनी मां को पुकार रहा है, क्या उसकी वेदना तू मिटा सकता है?”
कर्ण निरुत्तर हो गए। उन्होंने अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली। तब क्रोध से कांपते हुए ब्राह्मण ने अपना कमंडल उठाया और कर्ण को शाप दिया- “हे कर्ण! जिस प्रकार तूने रथ पर सवार होकर मेरी निसहाय गाय का वध किया है, उसी प्रकार एक दिन अपने जीवन के सबसे भीषण युद्ध में तेरे रथ का पहिया धरती में धंस जाएगा। उस समय तू असहाय होकर मृत्यु को प्राप्त होगा।”
समय बीत गया। महाभारत का महायुद्ध आरंभ हुआ। कर्ण कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे। रणभूमि में एक क्षण ऐसा आया जब परशुराम के शाप से वे अपनी दिव्य विद्याएं भूल गए और उसी समय ब्राह्मण के शाप के अनुसार उनके रथ का पहिया धरती में धंस गया। इस अवसर का लाभ उठाकर श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया। इस प्रकार ब्राह्मण का शाप सत्य सिद्ध हुआ और यह घटना कर्म तथा नियति के अटल विधान का प्रमाण बन गई।
