गढ़ मुक्तेश्वर स्थित प्राचीन गंगा मंदिर का रहस्य

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Published By Anjali Singh
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भोले शिवशंकर की महिमा को समझ पाना वैसे, तो किसी के वश की बात नहीं। धर्मशास्त्रों में तो इस बात का उल्लेख मिलता ही है। वर्तमान समय में भी शिव साधकों और उपासकों के कई ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं, जिन्हें देखकर लोग केवल श्रद्धावश शीश ही झुका पाते हैं।

पुरातत्वविज्ञानियों ने भी ऐसे रहस्यों के आगे हार मान ली। अति पुरातन गढ़ मुक्तेश्वर गंगा मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर प्रत्येक वर्ष एक अंकुर उभरता है, जिसके फूटने पर भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां निकलती हैं। इस विषय पर गहन शोध कार्य भी हुआ, लेकिन शिवलिंग पर अंकुर का रहस्य आज तक कोई समझ नहीं पाया है।- अनिल सुधांशु, ज्योतिषाचार्य

गढ़ मुक्तेश्वर में जनश्रुति है कि मंदिर की सीढ़ियों पर अगर कोई पत्थर फेंका जाए, तो जल के अंदर पत्थर मारने जैसी आवाज सुनाई पड़ती है। ऐसा महसूस होता है कि जैसे गंगा मंदिर की सीढ़ियों को छूकर गुजरी हों। यह किस वजह से होता है यह भी आज तक कोई नहीं जान पाया है। 

गढ़ मुक्तेश्वर मंदिर का मुख्य रहस्य शिव पुराण की एक कथा में निहित है, जिसके अनुसार महर्षि दुर्वासा ने शिवगणों को उनके उपहास के लिए श्राप दिया था और फिर उन्हें गंगा के तट पर इस स्थान पर आकर मुक्ति मिली थी। इस कारण इस तीर्थ का नाम पहले ‘गण मुक्तेश्वर’ पड़ा, जो बाद में ‘गढ़ मुक्तेश्वर’ में बदल गया। इस रहस्य से जुड़े अन्य रहस्य हैं, जो मंदिर की प्राचीनता और आध्यात्मिक शक्ति से संबंधित हैं। शिवगणों को श्राप से 

मुक्ति: शिव पुराण के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने शिवगणों को पिशाच बनने का श्राप दिया था। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान की तपस्या के बाद गंगा ने आकर इन गणों को इस श्राप से मुक्ति दिलाई थी।

शिव वल्लभपुर से गढ़मुक्तेश्वर : यह माना जाता है कि इस तीर्थ का प्राचीन नाम ‘शिव वल्लभपुर’ था और यहीं पर शिवगणों को मुक्ति मिलने के कारण इसका नाम ‘गण मुक्तेश्वर’ पड़ा, जो धीरे-धीरे ‘गढ़ मुक्तेश्वर’ हो गया।

नृगकूप : मंदिर के पास एक प्राचीन बावड़ी है, जिसे ‘नृगकूप’ के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में महाभारत में उल्लेख है कि राजा नृग श्राप के कारण गिरगिट बन गए थे और इस कूप में रहते थे। यह कूप आज भी ‘नक्का कुआं’ के नाम से प्रसिद्ध है। अन्य रहस्य : कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर में शिवलिंग पर अंकुरित होते हैं, जिसकी व्याख्या वैज्ञानिक नहीं कर पाए हैं और पुजारी इसे स्थान की आध्यात्मिक शक्ति मानते हैं।

ऐतिहासिक महत्व : यह मंदिर महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि राजा परीक्षित अपनी मृत्यु के बाद मोक्ष की तलाश में इस स्थान पर आए थे।

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