हिंदी भाषा में कला विषयक लेखन: चुनौतियां, संभावनाएं और यथार्थ
हिंदी भाषा में कला विषयक लेखन आज भी एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं बन पाया है। जबकि हिंदी भारत की सबसे व्यापक रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा है, फिर भी कला विमर्श के क्षेत्र में उसका स्थान अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है। इसके पीछे ऐतिहासिक, संस्थागत, सामाजिक और बाज़ार से जुड़ी अनेक जटिल वजहें हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है।
इस मामले में एक बड़ी चुनौती भाषा और शब्दावली से जुड़ी है। आधुनिक कला विमर्श में जिन अवधारणाओं—जैसे मॉडर्निज़्म,कन्सेप्चुअल आर्ट, इंस्टीच्युश्नल क्रिटिक, एस्थेटिक् , क्युरोटोरियल प्रैक्टिस —का व्यापक उपयोग होता है, उनके लिए हिंदी में या तो सर्वमान्य शब्द नहीं हैं, या जो अनुवाद उपलब्ध हैं वे प्रचलन में नहीं आ सके।
परिणामस्वरूप हिंदी में कला लेखन करने वाला लेखक या तो अंग्रेज़ी शब्दों का सहारा लेने को विवश होता है, या फिर अत्यधिक व्याख्यात्मक भाषा अपनाता है, जिससे लेखन का प्रवाह बाधित होता है। ऐसे में एक सुझाव तो यही है कि इन शब्दों को ज्यों का त्यों प्रयोग किया जाए I क्योंकि इस तरह के शब्द अब सहजग्राह्य हो चुके है और इसका धड़ल्ले से प्रयोग कला जगत में आम बातचीत में होता है I
दूसरी बड़ी चुनौती कला संस्थानों और अकादमिक ढाँचे से जुड़ी है। भारत में कला शिक्षा, कला इतिहास और कला आलोचना से संबंधित अधिकांश पाठ्यक्रम, शोध और प्रकाशन अंग्रेज़ी में केंद्रित रहे हैं। ललित कला अकादमियाँ, विश्वविद्यालय, संग्रहालय और गैलरियाँ भी लंबे समय तक अंग्रेज़ी को ही ‘गंभीर विमर्श’ की भाषा मानती रही हैं। इस संस्थागत झुकाव का सीधा प्रभाव हिंदी लेखन की संख्या, गुणवत्ता और दृश्यता पर पड़ा।
तीसरा पहलू कला बाज़ार से जुड़ा है। यह सच है कि भारतीय कला बाज़ार पर आज भी एक अभिजात्य वर्ग का प्रभुत्व है, जो अंग्रेज़ी को अपनी बौद्धिक और सामाजिक पहचान से जोड़कर देखता है। चूँकि अधिकांश कला संग्राहक, क्यूरेटर और गैलरी संचालक इसी वर्ग से आते हैं, इसलिए प्रदर्शनी कैटलॉग, प्रेस रिलीज़ और आलोचनात्मक लेखन में अंग्रेज़ी को प्राथमिकता दी जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी पट्टी के कलाकार भी अपनी प्रस्तुति में अंग्रेज़ी को अनिवार्य मान लेते हैं, चाहे उनका सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव हिंदी का ही क्यों न हो।
हालाँकि इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच कुछ सकारात्मक बदलाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। पिछले एक-दो दशकों में हिंदी में कला विषयक पुस्तकों की संख्या बढ़ी है—चाहे वे कला इतिहास, लोक एवं आदिवासी कला, आधुनिक भारतीय कला या समकालीन विमर्श पर आधारित हों। इसके साथ ही आलेखन डॉट इन जैसी वेबसाइटों और अन्य डिजिटल मंचों ने हिंदी कला लेखन को एक नया विस्तार दिया है। ये मंच न केवल लेखकों को अभिव्यक्ति का अवसर दे रहे हैं, बल्कि एक ऐसे पाठक वर्ग का निर्माण भी कर रहे हैं जो कला को अपनी भाषा में समझना चाहता है।
डिजिटल माध्यमों की भूमिका यहाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और ब्लॉग्स ने उस दूरी को कुछ हद तक पाटा है, जो पहले कला और आम हिंदी पाठक के बीच थी। आज युवा लेखक, कलाकार और समीक्षक बिना किसी बड़े संस्थागत समर्थन के भी हिंदी में सार्थक कला विमर्श खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। किन्तु इन सबके बावजूद आवश्यकता इस बात की भी है कि हिंदी के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में नियमित रूप से कला विषयक लेख, समीक्षा, परिचर्चा और साक्षात्कार का प्रकाशन होता रहे I
अंततः यह कहा जा सकता है कि हिंदी में कला विषयक लेखन की चुनौती केवल भाषा की नहीं, बल्कि दृष्टि और संरचना की भी है। जब तक कला विमर्श को अभिजात्य दायरे से बाहर निकालकर व्यापक सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक हिंदी को उसका वाजिब स्थान नहीं मिल पाएगा। लेकिन हाल के प्रयास यह संकेत देते हैं कि हिंदी कला लेखन धीरे-धीरे अपनी ज़मीन तलाश रहा है—और यही भविष्य के लिए सबसे आशाजनक संकेत है।-सुमन कुमार सिंह
