डायबिटिक घावों का 'चमत्कारी' इलाज! आईआईटी-बीएचयू और आईएमएस की टीम का मेथी-प्रोटीन हाइड्रोजेल क्रांति लाएगा

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
On

वाराणसी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-बीएचयू) और इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईएमएस), बीएचयू के शोधकर्ताओं ने गहरे मांसपेशीय घावों के उपचार तथा त्वचा की फोटो-सुरक्षा के लिए एक नवीन प्रकृति-प्रेरित प्रोटीन-मेथी आधारित बायोमैटेरियल विकसित किया है। यह अत्याधुनिक तकनीक अब क्लिनिकल परीक्षण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

इस शोध परियोजना का नेतृत्व डॉ. अवनीश सिंह परमार (आईआईटी-बीएचयू) एवं प्रो. वैभव जैन (आईएमएस-बीएचयू) ने किया। टीम द्वारा विकसित और पेटेंट कराया गया यह जैव-संयोजित पदार्थ ऊतक पुनर्जनन को तेज करता है, हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) किरणों से त्वचा की रक्षा करता है तथा इसमें शक्तिशाली एंटीमाइक्रोबियल गुण भी मौजूद हैं।

डॉ अवनीश सिंह परमार ने बताया कि डायबिटिक घाव जल्दी भरते नहीं हैं। ये शोध आने वाले दिनों में डायबिटिक घाव के उपचार में बहुत कारगर साबित होगा। यह तकनीक 20 जनवरी 2026 को यूपी हेल्थ टेक कॉन्क्लेव 1.0 में प्रस्तुत की गई, जिससे राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर इसके प्रभावी उपयोग की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं। यह उपलब्धि टिकाऊ तथा जैव-प्रेरित चिकित्सा समाधानों के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और समाजोपयोगी अनुसंधान के प्रति आईआईटी (बीएचयू) की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा, "यह शोध कार्य आईआईटी-बीएचयू में हो रहे उच्च स्तरीय ट्रांसलेशनल रिसर्च का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रकृति-प्रेरित बायोमैटेरियल का यह विकास न केवल चिकित्सा क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलेगा, बल्कि यह दर्शाता है कि हमारे संस्थान के वैज्ञानिक समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए नवाचार पर केंद्रित हैं। हमें गर्व है कि यह तकनीक अब क्लिनिकल ट्रायल की ओर अग्रसर है।"

इस नवाचार के विकास में युवा शोधकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनमें सुश्री शिखा त्रिपाठी (पीएमआरएफ फेलो, आईआईटी-बीएचयू) तथा डॉ. शिल्पी चौधरी (पीईसी, चंडीगढ़) शामिल हैं। चूहों एवं खरगोशों के मॉडल पर किए गए प्री-क्लिनिकल अध्ययनों में गहरे मांसपेशीय घावों का तीव्र उपचार, उत्कृष्ट जैव-संगतता तथा किसी भी प्रकार की विषाक्तता के अभाव की पुष्टि हुई है।

इस तकनीक का पेटेंट फाइल किया जा चुका है तथा अब इसे मानव क्लिनिकल परीक्षण शुरू करने के लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके व्यावसायिक एवं सामाजिक महत्व को देखते हुए शोध दल ने 'प्रो-एमाइलॉइडोकेयर प्राइवेट लिमिटेड' नामक स्टार्टअप की स्थापना की है, जो आई3एफ, आईआईटी (बीएचयू) में इनक्यूबेटेड है। इस स्टार्टअप को आईआईटी (बीएचयू) फाउंडेशन तथा जेआईसी स्टार्टअप अवॉर्ड के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है।

संबंधित समाचार