करियर का नए विकल्प : स्टार्टअप, फ्रीलांस और गिग इकोनॉमी 

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Published By Anjali Singh
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छले दो दशकों में भारतीय रोजगार व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया है। एक समय स्थायी नौकरी को ही सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक माना जाता था, लेकिन वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण और तकनीकी नवाचार ने करियर की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती दी है। भारतीय जेन-जी यानी 18 से 27 वर्ष की उम्र के युवाओं का करियर को लेकर नजरिया तेजी से बदल रहा है। लिंक्डइन और रैंडस्टैड के संयुक्त अध्ययन पर आधारित हालिया रिपोर्ट बताती है कि आज का युवा वर्ग पारंपरिक नौकरियों से ज्यादा साइड इनकम और फ्रीलांसिंग को प्राथमिकता दे रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जेन-जी अब केवल स्थिर नौकरी या तयशुदा करियर पाथ पर भरोसा नहीं कर रही, बल्कि वह अपनी स्किल, आजादी और डिजिटल प्लेटफॉर्म की ताकत पर दांव लगा रही है। आज स्टार्टअप, फ्रीलांस और गिग इकोनॉमी केवल वैकल्पिक रोजगार नहीं, बल्कि मुख्यधारा के करियर विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। सफलता उसी युवा को मिलेगी, जो इन विकल्पों को ट्रेंड नहीं, बल्कि सोच-समझकर चुना गया रास्ता माने। हालांकि इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी हैं। आइए आज इसके पहलुओं पर विस्तृत विश्लेषण करते हैं।- सत्यदत्त शुक्ला, चार्टर्ड अकाउंटेंट , लखनऊ

अवसरों का विस्तार

भारत आज दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में गिना जाता है। सरकारी और निजी रिपोर्टों के अनुसार देश में लगभग दो लाख पंजीकृत स्टार्टअप सक्रिय हैं, जो सीधे और परोक्ष रूप से लाखों युवाओं को रोजगार प्रदान कर रहे हैं। स्टार्टअप संस्कृति युवाओं को पारंपरिक पदानुक्रम से अलग, नवाचार और जिम्मेदारी का अवसर देती है। यहां कार्यक्षेत्र सीमित नहीं होता। एक कर्मचारी को कई भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं, जिससे सीखने की गति तेज होती है। इसके साथ ही स्टार्टअप संस्कृति अपने आसपास के युवाओं को रोजगार के नए भी प्रदान करती है।

फ्रीलांस अर्थव्यवस्था: कौशल का बाजार

डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ फ्रीलांसिंग तेजी से बढ़ी है। विभिन्न आकलनों के अनुसार भारत में दो करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार से फ्रीलांस काम से जुड़े हैं। कंटेंट लेखन, डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन शिक्षण इस क्षेत्र के प्रमुख हिस्से बनकर उभरे हैं। फ्रीलांसिंग में डिग्री से ज्यादा महत्व कौशल और अनुभव का है। यही कारण है कि पारंपरिक शिक्षा से बाहर रह गए युवा भी इस मॉडल के जरिए आय अर्जित कर पा रहे हैं।

गिग इकोनॉमी: त्वरित आय

गिग इकोनॉमी का दायरा अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों तक तेजी से फैल चुका है। कैब सेवाएं, फूड और ई-कॉमर्स डिलीवरी प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन ट्यूटरिंग, डिजिटल मार्केटिंग और कंटेंट क्रिएशन जैसे क्षेत्रों में आज करोड़ों युवा अल्पकालिक अनुबंधों पर काम कर रहे हैं। विभिन्न आकलनों के अनुसार, आने वाले वर्षों में भारत की गिग वर्कफोर्स कुल श्रम शक्ति का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बन सकती है। यह मॉडल बेरोजगारी के दबाव को कुछ हद तक कम करने के साथ-साथ युवाओं को वैकल्पिक आय के अवसर भी प्रदान कर रहा है।

क्या संकेत देते हैं आंकड़े

आर्थिक सर्वेक्षण और श्रम अध्ययनों से संकेत मिलता है कि भविष्य में रोजगार सृजन का बड़ा हिस्सा पारंपरिक उद्योगों के बजाय सेवा, तकनीक और प्लेटफॉर्म आधारित कार्यों से आएगा। वहीं यह भी सच है कि इन क्षेत्रों में काम करने वाले युवाओं की औसत आय और कार्य-स्थिरता में भारी अंतर है। यानी नए करियर विकल्प अवसर तो दे रहे हैं, लेकिन समानता और सुरक्षा की गारंटी नहीं।

शिक्षा व्यवस्था और कौशल अंतर

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार के बीच की खाई इन नए मॉडलों में और स्पष्ट हो गई है। स्कूल और कॉलेज आज भी छात्रों को स्थायी नौकरी की तैयारी कराते हैं, जबकि बाजार लचीले, बहु-कौशल वाले और तकनीक-सक्षम युवाओं की मांग कर रहा है। इसका परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवा या तो बेरोजगार हैं या अपनी योग्यता से कम काम करने को मजबूर हैं।

मानसिक और सामाजिक प्रभाव

स्टार्टअप, फ्रीलांस और गिग इकोनॉमी में काम करने वाले युवाओं में तनाव और असुरक्षा की भावना अधिक देखी जा रही है। आय की अनिश्चितता, सामाजिक दबाव और भविष्य की चिंता मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। यह पहलू अक्सर करियर चर्चा में उपेक्षित रह जाता है।

संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता

यह स्पष्ट है कि नए करियर विकल्प न तो पूरी तरह समाधान हैं और न ही पूरी तरह संकट। वे अवसर भी हैं और चुनौती भी। आवश्यकता इस बात की है कि युवा इन क्षेत्रों में प्रवेश से पहले कौशल, वित्तीय योजना और मानसिक तैयारी करें। साथ ही नीति निर्माताओं और शिक्षा संस्थानों को भी चाहिए कि वे करियर गाइडेंस, कौशल प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा के नए मॉडल विकसित करें।

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