कॉलेज का पहला दिन: जब कॉलेज जाना भी किसी मोर्चे पर जाने जैसा लगा

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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1999 का जुलाई महीना था। देश ऑपरेशन विजय के दौर से गुजर रहा था। कारगिल युद्ध की खबरें सुबह-शाम टीवी पर छाई रहती थीं। सड़कों पर सेना के ट्रक, रेलवे स्टेशनों पर जवानों से भरी रेलगाड़ियां और हर घर में युद्ध की चर्चाएं, पूरा माहौल रोमांच और तनाव से भरा हुआ था। उसी समय मुझे लखनऊ के IET में जून की काउंसलिंग के लगभग एक महीने बाद झांसी स्थित बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (BIET) की मैकेनिकल ब्रांच में प्रवेश लेना था।

इंजीनियरिंग में दाखिले की खुशी थी, लेकिन फर्स्ट ईयर में होने वाली रैगिंग की कहानियों ने मन में डर भी भर रखा था। एक तरफ नए जीवन की शुरुआत का उत्साह था, तो दूसरी तरफ अनजाने माहौल का भय। ऊपर से पूरे परिवार की उम्मीदों का बोझ भी सिर पर महसूस हो रहा था। IIT में चयन न होने का मलाल था, लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिलने का गर्व भी कम नहीं था। जैसे-जैसे 9 जुलाई नजदीक आ रहा था, घर में तैयारियां तेज हो गईं। कुछ कपड़े, बिस्तर और रोजमर्रा का जरूरी सामान समेटकर बड़े भाई के साथ कानपुर से होते हुए झांसी की यात्रा शुरू हुई। जुलाई का महीना और उत्तर भारत की बारिश, उस दिन भी मूसलाधार वर्षा हो रही थी। रास्ते में पहली बार छोटे-छोटे पथरीले पहाड़ दिखे। भले ही वे सिर्फ पठार थे, लेकिन मेरे लिए वे शोले फिल्म के पहाड़ों जैसे ही रोमांचक थे, क्योंकि इससे पहले पहाड़ मैंने कभी नहीं देखे थे।

BIET का कैंपस अपने आप में एक दुनिया था। पूरे उत्तर प्रदेश के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में सबसे बड़ा IIT कानपुर को छोड़कर। कानपुर रोड से कॉलेज के मुख्य प्रशासनिक भवन तक लगभग एक किलोमीटर का रास्ता, चारों तरफ खुले मैदान और बारिश से नहाई हरियाली। मन प्रसन्न हो गया। ऐसा लग रहा था, जैसे कुछ-कुछ होता है फिल्म के कॉलेज कैंपस में प्रवेश कर रहा हूं। संयोग से वह फिल्म भी उसी दौर में रिलीज़ हुई थी। पहले वृंदावन हॉस्टल में सामान रखा और फिर प्रवेश प्रक्रिया के लिए सिविल डिपार्टमेंट पहुंचे, जहां पूरे फर्स्ट ईयर की काउंसलिंग और एडमिशन हो रहे थे। सीनियर्स अभिभावकों के सामने बेहद विनम्र और सहयोगी थे, लेकिन हमें देखकर उनकी आंखों में एक अलग ही संदेश झलक रहा था- मानो कह रहे हों, “अब आ गए हो, अब यहीं के तौर-तरीके सीखने होंगे।”

अभिभावक भी अपने-अपने जिले या आसपास के इलाके के सीनियर्स खोज रहे थे, ताकि आगे बच्चों का ख्याल रखा जा सके। कन्नौज से कोई सीनियर नहीं मिला, लेकिन फर्रुखाबाद के एक सीनियर से भाई ने बात की। उन्होंने न सिर्फ भरोसा दिया, बल्कि पूरे चार साल सचमुच अभिभावक की तरह ध्यान भी रखा। सच ही कहा गया है, घर से दूर अपने जिले का कोई मिल जाए तो वह परिवार जैसा हो जाता है। शाम तक सभी छात्रों को कमरे आवंटित कर दिए गए। हॉस्टल वार्डन और शिक्षकों ने ध्यान रखा कि कोई क्षेत्रीय गुट न बने। हमारे कमरे में तीन तख्त थे, लेकिन उस शाम सिर्फ दो ही छात्र आए। मैं और फैजाबाद से आया मेरा एक सहपाठी, जिसे बाद में सब प्यार से “पप्पू” कहने लगे। पूरे बैच में लगभग 180 छात्र थे और हर किसी का कोई न कोई उपनाम उसकी आदत, बोली या स्वभाव के आधार पर रख दिया गया था, जो पहचान आज भी सिर्फ बैच के लोगों के बीच जीवित है।
   
शाम ढलते ही सीनियर्स की पूरी फौज हॉस्टल पहुंच गई। परिचय का पहला दिन था। अलग-अलग वर्षों के सीनियर्स के लिए अलग-अलग तरह से अभिवादन करना होता था। कहीं 90 डिग्री, कहीं 120 डिग्री और फाइनल ईयर के लिए पूरा साष्टांग प्रणाम। कॉलेज का परिचय गीत, बोलने का तरीका सब कुछ नया और रोमांचक था। राहत इस बात की थी कि यह सब मौज-मस्ती तक सीमित रहा, कोई प्रताड़ना जैसी घटना नहीं हुई। इन्हीं सीनियर्स में से कुछ से ऐसे गहरे रिश्ते बने, जो 27 साल बाद भी कायम हैं। इंजीनियरिंग के चार सालों में हमने सिर्फ तकनीकी शिक्षा ही नहीं सीखी, बल्कि लोगों से जुड़ना, परिस्थितियों के अनुसार ढलना, नेतृत्व करना और खुद को समझना भी सीखा। कॉलेज के पहले दिन जीवन का जो मूलमंत्र मिला, वह आज भी हर मोड़ पर काम आता है।-शिव मोहन, मुख्य इंटीग्रेशन अधिकारी, रेलवे परिवहन व्यवसाय, लार्सन एंड टुब्रो, यूएई