माता सीता: त्याग, धैर्य और आत्मशक्ति की अनुपम प्रतिमूर्ति... एक जीवन जो युगों से नारी चेतना को करता है प्रेरित

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Published By Muskan Dixit
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भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक चेतना में माता सीता केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण, धैर्य, करुणा, असीम पवित्रता और नारी मर्यादा की ऐसी जीवंत प्रतिमूर्ति हैं, जो युगों-युगों से नारी शक्ति को परिभाषित करती आई हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, यदि मन में धर्म, संयम और आत्मविश्वास अडिग हो, तो जीवन की हर अग्निपरीक्षा सार्थक बन जाती है। माता सीता का व्यक्तित्व स्त्री चेतना का वह स्वरूप प्रस्तुत करता है, जिसमें सौम्यता के साथ अडिग शक्ति का संतुलन  दिखाई देता है।

माता सीता के प्राकट्य की कथा भारतीय परंपरा की सबसे दिव्य और अर्थपूर्ण कथाओं में से एक है। रामायण के अनुसार मिथिला में एक समय भयंकर अकाल पड़ा था। ऋषियों के परामर्श पर मिथिला के राजा जनक ने स्वयं हल चलाने का संकल्प लिया, जिससे धरती माता प्रसन्न हों और वर्षा हो। जब राजा जनक खेत जोत रहे थे, तब हल का अग्र भाग, जिसे ‘सीत’ कहा जाता है, धरती में गड़े एक स्वर्ण कलश से टकराया। उस कलश से एक दिव्य, तेजस्वी और अनुपम सौंदर्य से युक्त कन्या प्रकट हुई। निःसंतान राजा जनक ने उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। हल के अग्र भाग से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम सीता पड़ा, राजा जनक की पुत्री होने के कारण वे जानकी कहलाईं और धरती से जन्म लेने के कारण भूमिजा। इस प्रकार माता सीता का जन्म स्वयं प्रकृति और धर्म के पवित्र मिलन का प्रतीक बन गया।

माता सीता का संपूर्ण जीवन त्याग, सहनशीलता और आत्मबल की जीवंत मिसाल है। राजमहल की सुख-सुविधाओं को छोड़कर वनवास स्वीकार करना, अपहरण, अकेलापन, लोकापवाद और कठोर परीक्षाओं को सहन करना-इन सबके बावजूद उन्होंने अपने चरित्र, आत्मसम्मान और धर्म से कभी समझौता नहीं किया। वे केवल भगवान राम की अर्धांगिनी नहीं थीं, बल्कि उनके धर्मपथ की सहचरी और नैतिक शक्ति भी थीं। उनका जीवन यह दर्शाता है कि नारी शक्ति मौन सहनशीलता नहीं, बल्कि मूल्यों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता है।

माता सीता को आदर्श पत्नी, पुत्री और स्त्री के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनकी भूमिका इन पारंपरिक सीमाओं से कहीं आगे जाती है। वे संबंधों में समर्पण के साथ आत्मसम्मान का संतुलन स्थापित करती हैं। उनका आचरण यह सिखाता है कि प्रेम में भी स्वाभिमान आवश्यक है और त्याग का अर्थ आत्मविस्मरण नहीं होता। यही कारण है कि माता सीता आज भी पारिवारिक जीवन, सामाजिक संरचना और नैतिक मूल्यों की आधारशिला मानी जाती हैं।
भारतीय परंपरा में माता सीता को लक्ष्मी स्वरूप भी माना गया है-सुख, समृद्धि और स्थायित्व का प्रतीक। उनके व्यक्तित्व में बाहरी वैभव से अधिक आंतरिक समृद्धि का महत्व दिखाई देता है। यही संदेश आज के उपभोक्तावादी और भौतिकतावादी समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। स्त्री को केवल सहनशील या त्यागमूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि सृजन, संतुलन और सामाजिक शक्ति के केंद्र के रूप में देखने की दृष्टि माता सीता के जीवन से ही विकसित होती है।

आधुनिक जीवन की भागदौड़, मानसिक तनाव और रिश्तों में बढ़ती जटिलताओं के बीच माता सीता का जीवन आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। वे सिखाती हैं कि धैर्य कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। जब मन स्थिर होता है, तो निर्णय स्पष्ट होते हैं और रिश्तों में मधुरता स्वतः विकसित होती है। यही कारण है कि आज भी ग्रामीण समाज से लेकर महानगरों तक, माता सीता का नाम पारिवारिक शांति और सामाजिक संतुलन से जुड़ा हुआ है।

माता सीता की आराधना केवल बाह्य पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके गुणों-संयम, करुणा, आत्मबल और सत्यनिष्ठा-को जीवन में उतारने का संकल्प है। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, चाहे वह परिवार हो, समाज हो या व्यक्तिगत संघर्ष, तो जीवन की कठिन से कठिन राह भी सहज और अर्थपूर्ण बन सकती है। जिस प्रकार उन्होंने अशोक वाटिका में रहते हुए भी अपने आत्मसम्मान और धैर्य को अडिग रखा, वह हर युग के लिए एक प्रेरणास्रोत है। आज के समय में, जब नारी सम्मान, मानसिक संतुलन और संवेदनशील रिश्तों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, माता सीता का जीवन हमें सच्ची शक्ति का अर्थ समझाता है-वह शक्ति जो भीतर से आती है और पूरे समाज को दिशा देती है।

श्वेता गोयल, लेखक

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