Uttrakhand: होली के गीतों से गूंज रही पहाड़ों की रातें, छलड़ी तक रंग भरेंगे राग

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Published By Monis Khan
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कमलेश कनवाल, अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की राते इन दिनों होली के गीतों से गूंज रही हैं। राग से रंग तक पहुंचने के लिए इस शहर की होली को करीब तीन महीने लगते हैं। यही वक्त कुमाउनी होली को देशभर की होलियों से अलग रंग में पिरोता है। डेढ़ सौ साल पहले बैठकी और खड़ी होली के रूप में शुरू हुए इस राग-फाग ने कई पीढ़िया देखीं लेकिन इसका महत्व बढ़ता ही गया।

दरअसल, कुमाऊं में होली गायन की परंपरा 165 वर्ष पूर्व अल्मोड़ा से शुरू हुई थी। अल्मोड़ा में पौष मास से फागुन तक तीन माह में पांच अलग-अलग चरणों में बैठकी और खड़ी होली का गायन होता है। पहला चरण आध्यात्मिक होली का है, जो पौष मास के प्रथम रविवार से बसंत पंचमी तक चलने वाली इस होली में निर्वाण पद गाए जाते हैं। 

दूसरा चरण बसंत पंचमी से महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व तक का है। इसमें प्रकृति आधारित गीत गाए जाते हैं। इसे श्रृंगारिक होली कहते हैं। तीसरा चरण महाशिवरात्रि से होलिका दहन तक चलता है। इसमें रंग भरे राग में हंसी-ठिठोली के गीत गाए जाते हैं। इसके साथ ही खड़ी होली के रंग भी बरसने लगते हैं। 

आखिरी राग है विदाई राजग, ये राग छलड़ी में होली का समापन पर गाया जाता है। वहीं, यहां तीन विधाओं में होली गायन होती है। जिसमें पहली बैठकी दूसरी खड़ी और तीसरी महिलाओं की होली है। इनमें सभी रागों की होली शामिल होती है। बैठकी होली में शास्त्रीय संगीत पर आधारित रागों का गायन होता है। तीसरी होली महिलाओं पर आधारित है। इस दौरान महिलाएं हंसी-मजाक के रंगों के साथ नृत्य में सराबोर रहती हैं।

वरिष्ठ रंगकर्मी राजेंद्र प्रसाद तिवारी बताते हैं कि अल्मोड़ा में वर्ष 1860 में बैठकी होली की शुरुआत उस्ताद अमानत हुसैन नामक एक कलाकार ने की थी। सभी समुदाय के लोग बढ़ चढ़कर होली गायन में भागीदारी करते थे। अल्मोड़ा में श्री भंडार हुक्का क्लब, त्रिपुरा सुंदरी और रानीधारा में होली गायन की शुरुआत हुई थी।

तीन महीने चलने वाले होलियों के रंग के अलावा और भी कई राग कुमाउनी होली में हैं। पीलू, भैरवी, श्याम कल्याण, काफी, परज, जंगला काफी, खमाज, जोगिया, देश विहाग व जै-जैवंती आदि शास्त्रीय रागों पर विविध वाद्य यंत्रों के साथ यहां होली गायी जाती है।

वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल सनवाल ने बताया कि अल्मोड़ा की होली पूरे कुमाऊं में अलग स्थान रखती है। हालांकि इस तरह की होली अन्य अंचलों में भी होती है, लेकिन यहां अलग-अलग मास और रागों पर गाई जाने वाली होली का विशेष महत्व है। कहना है कि अल्मोड़ा की होली में बनारस और मथुरा की होली के राग रंग झलकते हैं।

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