दृष्टि से बुद्धि तक : चश्मे का नया युग

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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कभी आंखें सिर्फ दृश्य पकड़ती थीं, अब वे डेटा, कमांड और सूचना की परतें पढ़ने लगी हैं। Smart Glasses इस बदलाव की मिसाल हैं। यह सिर्फ चश्मे नहीं, आंखों के सामने रखे मिनी-कंप्यूटर हैं- कैमरा, माइक, स्पीकर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस, लेकिन यह कहानी केवल आज की नहीं है, इसकी शुरुआत उस दौर से हुई थी, जब इंसान ने पहली बार दुनिया को साफ देखने का सपना देखा।

तेरहवीं सदी के इटली में जब शिल्पकारों ने दो छोटे लेंसों को धातु के घेरे में जड़ा, तब वह करुणा और विज्ञान का संगम था। इंसान अब किताब को बिना धुंध के पढ़ सकता था, स्पष्ट देख सकता था। यह केवल दृष्टि का आविष्कार नहीं था, बल्कि सभ्यता का आत्म-विस्तार था। धीरे-धीरे वही साधारण यंत्र पहचान और फैशन का प्रतीक बना। बीसवीं सदी में प्लास्टिक लेंस, हल्के फ्रेम और पोलराइज्ड तकनीक ने इसे हर वर्ग का साथी बना दिया। फिर तकनीक ने इस ‘दृष्टि’ में ‘बुद्धि’ जोड़नी शुरू की। - डॉ. शिवम भारद्वाज असिस्टेंट प्रोफेसर, जीएलए विश्वविद्यालय-मथुरा

स्टाइल, सुविधा और स्मार्टनेस का संगम

2013 में गूगल ने Google Glass पेश किया। दुनिया का पहला बड़ा wearable computer, जो आंखों के जरिए सूचना दिखाता था। यह प्रयोग अपने समय से आगे था, लेकिन समाज तैयार नहीं था। निजता, सुरक्षा और असहजता के प्रश्नों ने इसे रोक दिया। यह असफलता नहीं, चेतावनी थी कि तकनीक जितनी मनुष्य के करीब आती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। इसके बाद 2016 में Snapchat Spectacles आए। लक्ष्य था, जीवन के पलों को बिना हाथों के रिकॉर्ड करना। तकनीक हल्की थी, पर सोच अब भी कैमरे के इर्द-गिर्द घूम रही थी। कुछ वर्ष बाद Amazon Echo Frames (2019-2020) ने बिना स्क्रीन के केवल आवाज से संवाद की क्षमता दी। Alexa की आवाज सीधे कान तक पहुंचने लगी। अब Meta ने Ray-Ban के साथ मिलकर इन सब प्रयोगों को परिपक्व रूप दिया है। ऐसा उपकरण जो स्टाइल, सुविधा और स्मार्टनेस तीनों को साथ लेकर चलता है।

नवाचार की प्रयोगशाला बन सकता है भारत

अब इस दौड़ में भारत भी उतर चुका है। Lenskart ने फरवरी 2025 में Phonic Smart Glass लॉन्च किया। बेसिक ऑडियो सुविधाओं के साथ। अब मीडिया रिपोर्टों की मानें तो मार्च 2026 में वह B by Lenskart नाम से अपने एआई-संचालित ग्लास उतारने की तैयारी में है, जिसमें Gemini 2.5 AI, रीयल-टाइम अनुवाद, UPI भुगतान और स्वास्थ्य मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएं होंगी।

यह कदम भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक निर्माता की भूमिका में रखता है। कुछ समय पहले ही Meta ने भारत में Ray-Ban Meta Smart Glasses लॉन्च किए, जो Meta AI Integration और real-time translation जैसी क्षमताओं से लैस हैं। भारत, जो पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े wearable markets में से एक है, अब इस नवाचार की प्रयोगशाला भी बन सकता है। 

कानून को भी होना होगा चौकन्ना

तकनीक की गंभीरता जुलाई 2025 में Meta के उस कदम से भी समझी जा सकती है, जब उसने Essilor Luxottica में 3.5 बिलियन रुपये की लागत से 3 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी। सितंबर 2025 में कंपनी ने Ray-Ban Display Glasses की घोषणा की, जिनमें AR Display और Neural Wristband जैसी अत्याधुनिक तकनीकें हैं। यह स्मार्ट ग्लास विकास की एक निर्णायक छलांग है।

यह तेजी जितनी रोमांचक है, उतनी ही सावधानी भी मांगती है। सबसे बड़ी चुनौती है, निजता की रक्षा। जब हर चश्मे में कैमरा और माइक्रोफोन होंगे, तब यह तय करना कठिन होगा कि कौन-सा पल सार्वजनिक है और कौन-सा निजी। यूरोप और अमेरिका में इस पर पहले ही कानूनी बहस शुरू हो चुकी है। भारत में भी डेटा संरक्षण कानून को अब इन नए उपकरणों तक विस्तार देना होगा। तकनीक जब आंखों पर चढ़ती है, तो कानून को भी उतना ही चौकन्ना होना पड़ता है।

दृष्टिहीनों के लिए बन सकता आंख

दूसरा प्रश्न सामाजिक व्यवहार का है। स्मार्टफोन ने हमें ‘देखते हुए अनुपस्थित’ बना दिया, लोग साथ होते हुए भी स्क्रीन में गुम रहते हैं। अब जब सूचना की परत आंखों के सामने ही होगी, तो हमारी नजर में कितनी मानवीयता बचेगी? क्या हम दृश्य देखेंगे या उसका विश्लेषण? क्या हम सामने वाले व्यक्ति को देखेंगे या उसके बारे में डेटा? यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय भी है। फिर भी, इस तकनीक के लाभ गहरे और वास्तविक हैं। दृष्टिहीनों के लिए यह उपकरण आंख बन सकता है, जो सामने के दृश्य को आवाज में बदल दे।

डॉक्टर सर्जरी के दौरान रीयल-टाइम डेटा देख सकेंगे, इंजीनियर और पायलट अपने सामने निर्देश पा सकेंगे, शिक्षक प्रयोगशाला में छात्रों को वर्चुअल डेमो दिखा सकेंगे। यह परिवर्तन सुविधा का नहीं, कार्य-संस्कृति का विकास है। बाजार इस भविष्य को पहचान चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार 2024 में Smart Glasses Market लगभग $1.9 बिलियन का था और 2030 तक इसके चार गुना होने का अनुमान है। Essilor Luxottica ने 2025 की तीसरी तिमाही में वियरेबल्स में “exponential growth” दर्ज की है। Meta-Ray-Ban ने अपने पहले ही वर्ष में 10 लाख से अधिक यूनिट्स बेचे हैं। Xiaomi और Bose जैसी कंपनियां भी इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही हैं। यह केवल प्रयोग नहीं, बल्कि नया उपभोक्ता-अर्थशास्त्र बन चुका है।

भारत के लिए यह दोहरी भूमिका का समय है, निर्माण और नियमन दोनों में अग्रणी बनने का। यदि देश Made-in-India Smart Glasses को वैश्विक मंच पर उतारता है और साथ ही नागरिकों की निजता के लिए स्पष्ट नियम बनाता है, तो यह न केवल प्रौद्योगिकी, बल्कि नीति-निर्माण में भी नेतृत्व का उदाहरण होगा। अंत में, वही पुराना मगर जरूरी प्रश्न, क्या इंसान इस सुविधा के साथ अपनी संवेदना भी बचा पाएगा? बिजली ने रोशनी दी, पर नींद छीनी, इंटरनेट ने संवाद बढ़ाया, पर मौन कम कर दिया।

अब स्मार्ट ग्लासेस हमारे सामने वही परीक्षा रख रहे हैं। वे हमें देखने में मदद करेंगे, पर यह हम पर है कि हम क्या देखना चाहते हैं। दृश्य या उसकी व्याख्या। भविष्य अब सचमुच आंखों के सामने है। तकनीक ने दृष्टि को बुद्धि में बदला है, पर बुद्धि तभी सार्थक है, जब उसमें विवेक जुड़ा हो। स्मार्ट ग्लासेस केवल अगली तकनीकी छलांग नहीं, बल्कि मानव दृष्टिकोण का विस्तार हैं। यह उस यात्रा का नया अध्याय है, जो तेरहवीं सदी के कांच से शुरू होकर इक्कीसवीं सदी की कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक पहुंची है। चश्मे स्मार्ट हो गए हैं, अब जरूरत है कि देखने वाले भी उतने ही समझदार हों।