IIT Kanpur : ब्रह्मांड की दूरी मापने का भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका, आईआईटी कानपुर ने अंतरिक्ष की धुंध से सुलझाया सितारों का सटीक पता
कानपुर, अमृत विचार। सर्दियों में घने कोहरे वाली सड़क पर कार चलाना कितना मुश्किल होता है, आपकी कार की लाइट ही धुंध के कणों के कारण वापस लौटती प्रतीत होती है। ऐसे में सामने से आ रही गाड़ी की हेडलाइट कितनी दूर है, इसका अंदाजा लगाना काफी कठिन हो जाता है। अंतरिक्ष में भी जब वैज्ञानिक ''पल्सर'' जैसे तारों को देखते हैं, तो ठीक इसी तरह की मुश्किल पेश आती होता है।
लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के भौतिकी विभाग तथा स्पेस, प्लैनेटरी एंड एस्ट्रोनॉमिकल साइंसेज एंड इंजीनियरिंग (स्पेस) इकाई और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स पुणे के खगोल वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के इन ''लाइटहाउस'' की सटीक दूरी मापने का तरीका खोज निकाला है। पूरी तरह से इस भारतीय शोध ने दशकों पुरानी खगोलीय समस्या का सरल समाधान दिखा दिया है।
अंतरिक्ष में कुछ ऐसे ''लाइटहाउस'' हैं जो एक सेकेंड में दर्जनों बार चमकते हैं। इन्हें ही ''पल्सर'' कहते हैं। अभी तक वैज्ञानिकों के लिए यह बताना मुश्किल भरा काम था कि कोई पल्सर हमसे कितना दूर है। इस बड़ी समस्या का सटीक समाधान निकालने के लिए आईआईटी के शोधकर्ताओं ने तरंगों के बिखराव और समयावधि जैसे दो प्रमुख तथ्यों का गहन विश्लेषण किया।
जैसे कोहरे में लाइट फैल जाती है, वैसे ही अंतरिक्ष के मुक्त इलेक्ट्रॉनों (धूल के कणों) के कारण पल्सर की रेडियो तरंगें भी फैल जाती हैं, इसे ही तरंगों का बिखराव कहते हैं। इसी तरह जैसे ट्रैफिक ज्यादा होने पर गाड़ी की रफ्तार धीमी हो जाती है, वैसे ही ये तरंगें इलेक्ट्रॉनों से टकराकर पृथ्वी तक पहुंचने में थोड़ा समय लेती हैं। इसी समयावधि का अध्ययन किया गया।
वैज्ञानिकों ने इन दोनों चीजों तरंगों के बिखराव और समयावधि को आपस में जोड़ दिया। उन्होंने गणित के जरिए पता लगाया कि अगर तरंग इतनी ''धुंधली'' है और इतनी ''देर'' से पहुंची है, तो वह कितनी दूर से आ रही होगी। यह बिल्कुल उसी तरह का प्रयास रहा, जैसे किसी बल्ब की धुंधली रोशनी देखकर बता दिया जाए कि वह कितनी दूरी पर जल रहा है।
खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौती को मिला समाधान
आवधिक रेडियो तरंगें उत्सर्जित करने वाले तारों जैसे पल्सर की दूरी मापने वाले नई और प्रभावी शोध को आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के प्रतिष्ठित जर्नल मंथली नोटिसेज आफ द रायल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन को डॉ. आशीष कुमार (वर्तमान में एनसीआरए पुणे में), प्रो. अविनाश ए. देशपांडे और प्रो. पंकज जैन (आईआईटी कानपुर) ने संयुक्त रूप से किया है।
खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार तारों की सही दूरी मापना खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आकाश में किसी तारे की दिशा ज्ञात करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन उसकी वास्तविक दूरी निर्धारित करना कठिन होता है। दूरी मापने का सबसे विश्वसनीय तरीका त्रिकोणमितीय पैरालैक्स है, किंतु यह केवल निकटवर्ती तारों पर ही प्रभावी रूप से लागू होता है।
अन्य विधियों, जैसे न्यूट्रल हाइड्रोजन आधारित तकनीकों में त्रुटि की संभावना ज्यादा रहती है। शोधकर्ताओं ने नई तकनीक आकाशगंगा के दक्षिणी भाग में स्थित विशाल गैसीय क्षेत्र गम नीहारिका की दिशा में मौजूद पल्सरों पर लागू कर दिखाई है। यह विधि उन सैकड़ों ज्ञात पल्सरों पर भी लागू की जा सकती है, जिनके प्रेक्षणीय आंकड़े पहले से उपलब्ध हैं।
क्या होते हैं पल्सर?
पल्सर वास्तव में मरे हुए विशाल तारों के अवशेष होते हैं, जो काफी तेजी से घूमते हैं। इनसे रेडियो तरंगें निकलती हैं जो पृथ्वी तक ''टिक-टिक'' की आवाज की तरह पहुंचती हैं। इसीलिए इन्हें अंतरिक्ष का ''लाइटहाउस'' कहा जाता है। माना जाता है कि पल्सर इतने घने होते हैं कि उनके एक चम्मच पदार्थ का वजन किसी बड़े पहाड़ जितना हो सकता है।
यह खोज क्यों है खास
- इससे हमारी आकाशगंगा का सटीक 3-डी नक्शा तैयार करने में मदद मिलेगी।
- पल्सर की सही दूरी पता होने से गुरुत्वाकर्षण तरंगों और ब्लैक होल के बारे में बेहतर जानकारी मिलेगी।
- इस पद्धति के व्यापक उपयोग से आकाशगंगा के इलेक्ट्रॉन घनत्व मॉडल अधिक सटीक बनाए जा सकेंगे।
- पल्सरों की वास्तविक गति, स्थिति और रेडियो चमक का बेहतर अनुमान संभव होगा।
- यह तरीका बाह्य-आकाशगंगीय तीव्र रेडियो फ्लैश जैसे फास्ट रेडियो बर्स्ट की दूरी और उनके परिवेश को समझने में भी सहायक सिद्ध होगा।
