अनुभूति: छोलिया की याद

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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छोलिया शब्द के साथ बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हैं। बीते दिनों छोलिया लेकर आई तो सब्जी बनाते हुए चलचित्र की भांति कितनी ही यादें आंखों के आगे तैर आईं। किंग्जवे कैंप का घर टूटने पर हमें जहांगीरपुरी में डीडीए द्वारा बनाए नए फ्लैट्स में शिफ्ट कर दिया गया। जिस घर में पैदा हुई उसे छोड़कर जाना, स्कूल, सहेलियां, बचपन के खेल, मां की यादें सभी तो उसी घर से जुड़ी थीं। मायूसी, दर्द और असहनीय पीड़ा का अहसास तारी था बस।

उस वक़्त बहुत बड़ी नहीं थी, पर इतनी भी छोटी नहीं थी। पापा बताते हैं कि वह पाकिस्तान से माइग्रेट होकर यहां आए थे, कैंप टूटने पर मुझे भी यही महसूस होता था कि हमें भी जैसे देश निकाला मिल गया हो। कहां किंग्सवे कैंप का खुला-खुला घर और कहां जहांगीरपुरी के दड़बे जैसा फ्लैट! रसोई, एक इकलौता कमरा और एक नन्हा सा वेहड़ा! हम दो परिवार इस एक कमरे के फ्लैट में शिफ्ट हुए। कैसे रहे? याद करती हूं, तो मन भर आता है।

नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी आसान कहां होती है भला? घर छोटे-छोटे थे अत: अधिकतर लोग घर के बाहर चारपाई बिछा उसी पर बैठे कई काम निपटा लेते। सब्जी काटना, सिलाई मशीन पर कपड़े सिलना, कपड़े तह करना और जाने कितने काम। मैले कपड़े गली के बाहर लगे सार्वजनिक नल पर जाकर धोए जाते। इन कामों में एक काम था छोलिया छिलना। सर्दी की गुनगुनी धूप में घर के काम निपटाकर कुछ महिलाएं स्वेटर बुनती, कुछ सिलाई कढ़ाई करतीं तो कुछ छोलिया छिलने बैठ जाती। पहले पहल तो समझ न आया कि रोज इतने छोलिए का करती क्या होंगी।

फिर पता चला कि सब्जी वाले भैया छोलिया छिलने के बदले पैसे देते हैं। ढेर के ढेर हरे छोलिए के गठ्ठर सामने पड़े रहते और महिलाएं बतियाते हुए बीनती जाती। सच पूछिए तो आसान काम नहीं था ये। अपने घर के लिए छोलिया छीलते हुए ही हाथ थक जाते थे और वे महिलाएं तो बिना नागा ढेर सारा छीलती थीं। छिला छिलाया छोलिया लाई और झटपट बना भी लिया, लेकिन जाने क्यों ये सब आज बहुत याद आया।-अंजू खरबंदा

 

 

 

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