शक्ति उपासना का केंद्र शक्तिपीठ मां देवीपाटन मंदिर

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Published By Anjali Singh
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उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद के तुलसीपुर तहसील के पाटन गांव में स्थित मां देवीपाटन मंदिर हिंदू धर्म के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता सती के शरीर का पवित्र भाग गिरा था और यही कारण है कि यह स्थल शक्ति का धाम, आस्था का केंद्र और तीर्थस्थल के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित है। शक्ति पीठों का पौराणिक चरित्र देवी भागवत पुराण, स्कंद पुराण, कलिका पुराण और शिव पुराण में वर्णित है। - नमिता वैश्य

देवीपाटन शक्तिपीठ के संदर्भ में माना जाता है कि यहीं पर माता सती का बायां स्कंध (कंधा) वस्त्र सहित गिरा था और इसी कारण से इसे शक्तिपीठ का स्थान प्राप्त हुआ। यहां माता को “पाटेश्वरी” के नाम से पूजा जाता है अर्थात वह देवी, जिसका संबंध उस पाट वस्त्र से स्थापित है।  यह स्थल केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, अपितु सांस्कृतिक आस्था, शक्ति, भक्ति और दैवीय शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि देवी के गिरने वाले भाग के कारण यहां शक्ति की ऊर्जा सदियों से जीवित है। श्रद्धालु पवित्र सूर्यकुंड में स्नान कर मंदिर के भीतर स्नानादि अनुष्ठान के माध्यम से स्वयं को दिव्य शक्ति से जोड़ते हैं। 

महारथी कर्ण ने यहां ली थी दिव्यास्त्रों का दीक्षा: एक लोक विश्वास के अनुसार द्वापर युग में यहां सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यकुंड में स्नान करने के बाद परशुराम से दिव्यास्त्रों की दीक्षा प्राप्त की थी। इसी कारण से इस स्थान की महिमा और भी बढ़ जाती है। यहां पर शिव-दुर्गा की शक्ति की अनुभूति अलग-सी होती है। गर्भगृह से नीचे पाताल तक प्राचीन सुरंग की कथा कही जाती है और आज भी माना जाता है कि त्रेतायुग से जलती हुई अखंड ज्योति देवी की शक्तिमत्ता का प्रमाण है। देवीपाटन शक्ति पीठ ऐतिहासिक रूप से उत्तर भारत में शक्ति की उपासना का मुख्य केंद्र रहा है। इस पीठ की स्थापना नाथ संप्रदाय के आदिगुरु गोरखनाथ ने की थी। यहां के आसपास ऋ षि-मुनियों के तप और साधना की कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें गुरु गोरखनाथ और सिद्ध रत्ननाथ (नेपाल) जैसे संतों का नाम उल्लेखनीय है, जिन्हें यहीं सिद्धि प्राप्त हुई थी, जिससे इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता और भी स्पष्ट होती है। 

भारत-नेपाल का सांस्कृतिक सेतु: यह शक्तिपीठ दो देशों भारत और नेपाल के सांस्कृतिक सेतु के रूप में भी प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसे भारत-नेपाल के बीच एक सांस्कृतिक सेतु बताया है, जो देवी के सान्निध्य में सामाजिक एवं आध्यात्मिक जुड़ाव को मजबूती प्रदान करता है। देवीपाटन मंदिर को श्रद्धालु केवल पूजा-स्थल के रूप में नहीं देखते, अपितु यह एक ऐसा स्थान है, जहां देवी की कृपा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, ऐसी मान्यता प्रचलित है। भक्त मानते हैं कि मां पाटेश्वरी के दर्शन तथा पूजा से जीवन की इच्छाएं, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 

मुख्य आकर्षण: शक्ति पीठ के मुख्य आकर्षणों में सूर्यकुंड, अखंड धूनी (जहां निरंतर धूना जलाई जाती है) तथा गोपनीय पूजा-अर्चना शामिल हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र के समय यहां विशेष रूप से भक्तों का भारी आस्था- ज्वार उमड़ता है। नवरात्रि पर करीब 15 दिनों तक राजकीय मेला लगता है, जिसमें देश के विभिन्न प्रांतों समेत नेपाल के श्रद्धालु आराधना के लिए आते हैं। मंदिर परिसर में नौ दुर्गा रूपों की प्रतिमाएं, विधि-विधान से पूजा-पाठ, दीप प्रज्ज्वलन, हवन-पूजन और लाल चुनरी, सिंदूर, फूलों सहित अनेक भेंट-वस्तुओं का समर्पण इस पूजा परंपरा को और भी समृद्ध बनाते हैं। मां की पूजा अलौकिक एवं अद्वितीय है। अर्द्धरात्रि के दूसरे पहर एक से चार बजे तक पूजा का समय निश्चित है, इसका समय कभी नहीं बदलता। 

समय के साथ इस मंदिर की महत्ता मात्र धार्मिक ही नहीं रह गई, अपितु यह देश का एक आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी बन गया है। मुख्यमंत्री का दूसरा घर कहे जाने वाले शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर को और भव्य बनाने के प्रयास प्रारंभ हो चुके हैं। अयोध्या धाम में आने वाले धार्मिक पर्यटक शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर की ओर उन्मुख हों, इसके लिए सरकार ने 42 करोड़ 50 लाख रुपये दिए हैं। बलरामपुर प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार ने मंदिर के आसपास 50 एकड़ क्षेत्र का विकास करने की योजना बनाई है, जिससे यहां धार्मिक पर्यटन को और भी बढ़ावा मिले।  इस तरह जा सकते हैं मंदिर: मंदिर तक पहुंचने के लिए सबसे सरल रेल मार्ग सेवा है। लखनऊ तथा गोरखपुर ट्रेन के द्वारा आने पर तुलसीपुर रेलवे स्टेशन पर उतरना होगा। यहां से लगभग डेढ़ किलोमीटर मंदिर तक पहुंचने के लिए रिक्शा आदि की सुविधा है। बस से भी तुलसीपुर पहुंचा जा सकता है। लखनऊ से गोरखपुर की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है।

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