लखुडियार : हजारों साल पुरानी रॉक पेंटिंग
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद में अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ मार्ग पर नगर से 14 किलोमीटर आगे पेटशाल गांव में नदी के किनारे स्थित है - लखुडियार। लखुडियार का शाब्दिक अर्थ है ‘एक लाख (लख) गुफाएं (उडियार)। यह एक प्रागैतिहासिक शैलाश्रय (रॉक शेल्टर) है, जो शैल चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यह शैल चित्र लगभग 6000 वर्ष पुराने हैं और उस समय के आदिमानव द्वारा इन विशाल शिलाओं में बनाए गए थे।-दीपक नौगांई
लखुडियार की खोज 1968 में डा .एमपी जोशी ने की थी। इस खोज के बाद अल्मोड़ा जिले के फड़कनौली, कलामाटी , मल्ला पनेली आदि स्थानों पर भी रॉक आश्रयों की खोज की गई। ये शैलाश्रय भौगोलिक दृष्टि से कालामाटी- दीनापानी पर्वत श्रृंखला की पूर्वी दिशा में लगभग 15 किलोमीटर के दायरे में केंद्रित है। ये शैल चित्र उस समय के दैनिक जीवन, शिकार और सभ्यता को दर्शाते हैं।
मुख्य सड़क से लगभग 25 मीटर अंदर सर्प के फन के समान आकृति की विशाल शिला में प्रागैतिहासिक मानव चित्रण कला का उत्कृष्ट अंकन मिलता है। चित्रों में अधिकांश मानव चित्रण के साथ साथ कहीं-कहीं पर पेड़ों तथा पशुओं की आकृति का चित्रण भी है। अलंकरण के लिए लहरदार रेखाओं और बिंदुओं का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। लहरदार रेखाओं को इतिहासकार नदी की लहरों के रुप में पहचानते हैं, तो कुछ इसे सर्प की आकृति बताते हैं।
यहां पर छतनुमा चट्टान फर्श से बहुत आगे निकली हुई है। स्थल को देखकर लगता है कि अग्रभाग लगभग चार-पांच मीटर टूट चुका है। इस शिला में अधिकतर चित्र गहरे गेरुए रंग में बने हैं। कहीं-कहीं पर हल्के काले और सफेद रंग से बने चित्र भी दिखाई देते हैं। चित्रों की विषय वस्तु में मुख्यतः पंक्तिबद्ध मानव, पशु, वृक्ष, ज्यामितीय नमूने और आखेटीय चित्र हैं।
मानव आकृतियां पंक्तिबद्ध में एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए चित्रित किए गए हैं। कहीं एक पंक्ति में दस तथा कहीं इससे कम मानव आकृतियां अंकित हैं। इसकी विशेषता यह है कि प्रथम मानव से अंतिम मानव एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए छोटे होते जा रहे हैं। शिला में ऐसे चित्रण भी हैं, जहां पंक्तिबद्ध मानव एक दूसरे का हाथ नहीं पकड़े हुए हैं। प्रथम दृश्य में ये मानव अपने हाथ में कोई वस्तु धारण किए हुए हैं। संभवत यह आखेट का चित्रण है।
लखुडियार के चित्रों में मानव तथा वृक्षों के चित्र समान आकृति के प्रतीत होते हैं। किंतु मानव आकृतियों में स्पष्ट रूप से गर्दन सहित शीर्ष बनाया गया है। कहीं-कहीं मानव आकृतियों में सिर पर पीछे की ओर लंबे बालों के जुड़े अथवा चोटी बनाई गई है। संभवतः यह नारी की आकृति है।
इन शैल चित्रों को देख कर लगता है कि तत्कालीन मानव ने अभिव्यक्ति के लिए भाषा से पहले कला का प्रयोग किया होगा। ये चित्रण उस समय के मानव समाज और उनकी रुचि तथा सोच को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण स्रोत है। लखुडियार में प्राप्त शैल चित्रण से स्पष्ट है कि कुमाऊं क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से ही मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है।
पुरातत्व विभाग ने 1992 में लखुडियार को अपने सरंक्षण में तो ले लिया पर इसे सुरक्षित और सहेज कर रखने के कोई इंतजाम नहीं किए है। मानवीय हस्तक्षेप तथा प्राकृतिक कारणों से अधिकांश चित्रण धूमिल हो गए हैं। यह स्थान इतिहासविद और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण का केंद्र है, जो हमें पाषाण युग की कलात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ता है। आज जरूरत इस अद्भुत शैल चित्रण को संरक्षित और बचाने की है।
