विश्व किडनी दिवस आज: प्लास्टिक, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा किडनी रोग, विशेषज्ञों से जाने बचाव के तरीके 

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Published By Anjali Singh
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लखनऊ, अमृत विचार : जलवायु परिवर्तन, बढ़ते वायु प्रदूषण और प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग किडनी रोगों का खतरा बढ़ा रहा है। युवा तेजी से बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। जागरूकता से इस बीमारी से बचा जा सकता है। इसी उद्देश्य से इस वर्ष विश्व किडनी दिवस की थीम पृथ्वी और पर्यावरण में हो रहे बदलावों का किडनी स्वास्थ्य पर प्रभाव पर केंद्रित किया गया है।

इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलाजी के सचिव व एसजीपीजीआई में नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद ने बताया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं और खून के माध्यम से किडनी तक पहुंच जाते हैं। ये कण किडनी के ऊतकों में जमा होकर सूजन और नुकसान पैदा कर सकते हैं। 

नैनो और माइक्रो प्लास्टिक भी मानव शरीर के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं। शोध में पाया गया है कि प्लास्टिक के अत्यंत छोटे कण लाल रक्त कोशिकाओं, मस्तिष्क और किडनी के ऊतकों तक पहुंच सकते हैं। यह नुकसान धीरे-धीरे होता है और शुरुआती चरण में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ यह गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ती गर्मी भी किडनी के लिए खतरा बन रही है। 

अधिक गर्मी के कारण शरीर में बार-बार हल्की किडनी चोट हो सकती है, जो धीरे-धीरे स्थायी क्षति में बदलकर क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) का रूप ले सकती है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से जुड़ी मेटाबोलिक किडनी बीमारी भी तेजी से बढ़ रही है। इस स्थिति में पेशाब में एल्ब्यूमिन का रिसाव होने लगता है और धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम होती जाती है।

आधुनिक दवाओं से टल सकती है डायलिसिस

डॉ. नारायण के अनुसार कुछ आधुनिक दवाएं जैसे सेमाग्लूटाइड, रेनिन-एंजियोटेंसिन सिस्टम ब्लॉकर्स और नॉन-स्टेरॉयडल मिनरलोकोर्टिकोइड रिसेप्टर एंटागोनिस्ट चिकित्सकीय निगरानी में शुरू करने से किडनी रोग की प्रगति 40 से 70 प्रतिशत तक धीमी की जा सकती है। कई मामलों में इससे डायलिसिस की जरूरत 5 से 10 वर्ष तक टाली जा सकती है।

किडनी ट्रांसप्लांट की भारी कमी

डॉ. नारायण के अनुसार देश में हर साल लगभग दो लाख मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है, लेकिन केवल 12 से 15 हजार मरीजों का ही ट्रांसप्लांट हो पाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डायलिसिस की जरूरत पड़े तो घर पर की जाने वाली पेरिटोनियल डायलिसिस एक बेहतर विकल्प हो सकती है। एसजीपीजीआई से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक एक साल के भीतर 111 महिलाओं ने किडनी डोनेट की है, जबकि ऐसा करने वाले पुरुष सिर्फ 16 हैं। इन महिलाओं ने पति, बेटों, बेटियों को किडनी दान की है।

दर्द निवारक दवाओं से बचे

डॉ. नारायण प्रसाद का कहना है काम को लेकर लोग तनावग्रस्त हो रहे हैं। सिर दर्द होने पर तत्काल दर्द निवारक दवा ले लेते हैं। शरीर में अन्य पीड़ा होने पर भी दर्द निवारक दवाओं का सेवन अंधाधुंध किया जा रहा है। अत्यधिक दर्द निवारण दवाएं किडनी पर बुरा प्रभाव डालती हैं।

किडनी रोग से बचाव के लिए ये करें उपाय

विशेषज्ञों के अनुसार जीवनशैली में बदलाव लाकर किडनी रोग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए शरीर का बीएमआई 25 से कम रखना, रोजाना 500 से 700 कैलोरी कम लेना, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम करना, प्रतिदिन 0.8 ग्राम प्रति किलोग्राम के हिसाब से प्रोटीन लेना और नमक का सेवन 5 ग्राम से कम रखना जरूरी है।

शुरुआती चरण में नहीं दिखते स्पष्ट लक्षण, नियमित जांच जरूरी

किडनी रोग विशेषज्ञ (होम्योपैथी) डॉ. अर्चना श्रीवास्तव ने बताया किडनी से जुड़ी बीमारियों को अक्सर खामोश रोग कहा जाता है, क्योंकि इसकी शुरुआत में आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। विशेषज्ञों के अनुसार बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और कई बार मरीज को तब तक इसका पता नहीं चलता, जब तक किडनी काफी प्रभावित नहीं हो जाती।

प्रारंभिक चरण में दर्द या कोई विशेष परेशानी महसूस नहीं होती। किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती है, इसलिए शरीर तुरंत कोई बड़ा संकेत नहीं देता और मरीज सामान्य जीवन जीता रहता है। बीमारी बढ़ने पर लक्षण सामने आने लगते हैं। इनमें शरीर में सूजन, अत्यधिक थकान, पेशाब में झाग आना, भूख कम लगना और कमजोरी जैसे संकेत शामिल हैं। कई मामलों में मरीज को इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज करने की भी आदत होती है। कई लोगों में किडनी की समस्या का पता नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान ही चलता है। पेशाब और खून की जांच में किडनी की कार्यक्षमता से जुड़े संकेत मिलने पर बीमारी का पता लगाया जाता है।

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