संपादकीय:ऊर्जा सुरक्षा पर संकट

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Published By Monis Khan
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पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बनता दिख रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड साउथ पर्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान द्वारा नौ देशों में तेल और गैस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना क्षेत्रीय तनाव के साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह संकट जितना भू-राजनीतिक है, उतना ही मानवीय भी, क्योंकि इसकी सीधी चोट आम उपभोक्ता की जेब और जीवन पर पड़ेगी। साउथ पर्स, समरेफ रिफाइनरी और कतर का रास लफान जैसे संयंत्र विश्व ऊर्जा आपूर्ति की धुरी हैं।

इन पर हमले से सप्लाई चेन बाधित होती है, बीमा लागत बढ़ती है और समुद्री परिवहन जोखिमपूर्ण हो जाता है। परिणामस्वरूप, बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है और कीमतों में उछाल आता है। इंडियन बास्केट का ब्रेंट क्रूड 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा, जहां कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात होता है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फ्रांस, कतर और मलेशिया जैसे देशों के साथ शांति की अपील सकारात्मक कूटनीतिक पहल है। भारत की “संतुलित और संवाद-प्रधान” विदेश नीति इस समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केवल कूटनीति से तत्काल युद्धविराम हो जाएगा। फिर भी, भारत की अपील है कि नागरिक और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना न बनाया जाए। नैतिक दबाव जरूर बनाती है, विशेषकर तब जब वैश्विक समुदाय भी इसी चिंता को साझा करता है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह आश्वासन कि इजराइल साउथ पर्स पर दोबारा हमला नहीं करेगा, राजनीतिक बयान अधिक प्रतीत होता है। जमीनी हकीकत यह है कि जब तक क्षेत्रीय अविश्वास और प्रतिद्वंद्विता बनी रहेगी, ऐसे हमलों की आशंका बनी रहेगी। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर बहुआयामी होता है। भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों पर तत्काल प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि सरकार करों में कटौती या सब्सिडी के माध्यम से अस्थायी राहत दे सकती है, विशेषकर चुनावी राज्यों में, लेकिन यह राहत स्थायी नहीं होती। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्यान्न, दवाइयां और दैनिक उपभोक्ता वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।

महंगाई का यह चक्र अंततः आम आदमी की क्रय शक्ति को कमजोर करता है। यह भी एक यथार्थ है कि चुनावों तक कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की जाएगी, परंतु वैश्विक बाजार की ताकतें घरेलू नीतियों पर भारी पड़ सकती हैं इसलिए यह मान लेना कि कीमतें नहीं बढ़ेंगी, व्यावहारिक नहीं है। इस संकट से उबरने के लिए भारत को बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। पहला, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों जैसे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की ओर रुख करना। दूसरा, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को तेजी से बढ़ावा देना, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो। तीसरा, ऊर्जा कूटनीति को और सक्रिय बनाना, ताकि संकट के समय विश्वसनीय साझेदार उपलब्ध रहें। यह केवल तेल और गैस का संकट नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा है। भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपने हितों की रक्षा के साथ शांति और सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त करना होगा।