लखनऊ : 25-30 लाख रुपये में तय करते थे नौकरी का सौदा, एसटीएफ गिरोह के नेटवर्क की कुंडली खंगालने में जुटी
लखनऊ, अमृत विचार: सीबीएसई की जूनियर सेक्रेटेरियट असिस्टेंट समेत अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सॉल्वर बैठाने वाले सरगना समेत नौ सदस्यों को एसटीएफ ने बुधवार को गिरफ्तार किया। एसटीएफ की अब तक की जांच में सामने आया कि सॉल्वर बैठाने और नौकरी दिलाने के नाम पर 25-30 लाख रुपये में ठेका लिया गया था। गिरोह का नेटवर्क पूरे देश में फैला है। यह गिरोह कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सॉल्वर बैठाने के साथ ही फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने का काम किया है। गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश की जा रही है।
एसटीएफ के डिप्टी एसपी विमल कुमार सिंह की टीम ने बुधवार को सीबीएसई की जूनियर सेक्रेटेरियट असिस्टेंट की प्रतियोगी परीक्षा में सॉल्वर गिरोह का खुलासा किया। इस गिरोह के नौ सदस्य गिरफ्तार किये गये। आठ लखनऊ के विकासनगर और एक गोरखपुर से दबोचा गया। शुरूआती जांच में सामने आया कि गिरोह ने विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाने के साथ नौकरी दिलाने का ठेका लिया था। इस गिरोह ने इसके पहले भी कई परीक्षाओं में इस तरह का काम किया है।
एसटीएफ के मुताबिक आरोपियों से पूछताछ में चौंकाने वाले खुलासे हुए। आरोपी राज किशोर ने कबूल किया कि उसने बेरोजगारी के चलते खेत बेचकर 1 लाख रुपये देकर फर्जी लो-विजन दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाया था। नीरज झा पेशेवर स्क्राइब निकला, जो कई परीक्षाओं में पैसे लेकर बैठ चुका है। उसने बताया कि थर्ड क्लास नौकरी के लिए 18-20 लाख और फोर्थ क्लास के लिए 4 लाख रुपये तक लिए जाते हैं। राम मिलन और अभिषेक यादव ने भी फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाकर परीक्षाएं देने की बात स्वीकार की। सत्यम कुमार जैसे स्क्राइब लाखों रुपये लेकर परीक्षाएं दिलाने का काम करते थे। गिरोह ने रेट कार्ड बना रखा था। जिसके अनुसार प्री परीक्षा: 15-25 हजार रुपये, तृतीय श्रेणी की नौकरी के लिए 18-20 लाख, बैंक क्लर्क व पीओ जैसी नौकरियों के लिए 20-30 लाख रुपये रेट तय था।
14 वर्ष से चला रहा गिरोह
गिरोह का सरगना मनीष मिश्रा गोरखपुर से पकड़ा गया। पूछताछ में उसने बताया कि वह पिछले 14 वर्ष से इस गिरोह को चला रहा है। उसके साथ आकाश अग्रवाल, सौरभ सोनी भी प्रमुख सदस्य हैं। तीनों ने मिलकर बुंदेलखंड इलाके में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाकर सैकड़ों अभ्यर्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में पास कराने और नौकरी दिलाने का काला कारोबार खड़ा किया है। उसने बताया कि प्रतियोगी परीक्षा और नौकरी के हिसाब से रेट तय किया जाता था। सभी को काम के अनुसार हिस्सा दिया जाता था।
बनवाए थे फर्जी प्रमाण पत्र
आरोपियों ने पूछताछ में कुबूल किया कि जो भी दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाया है। वह सारे फर्जी हैं। 50 हजार से डेढ़ लाख रुपये एक प्रमाण पत्र के नाम पर वसूलते थे। जिसमें सीएमओ कार्यालय से लेकर गिरोह के सदस्य व दलालों तक का दाम तय होता था। शुरूआती जांच में सामने आया कि आरोपियों ने ज्यादातर प्रमाण पत्र झांसी, जालौन व ललितपुर जिले से बनवा रखे हैं। यहीं पर इनके गिरोह का पूरा नेटवर्क फैला है। इसमें सीएमओ कार्यालय से लेकर तहसील तक के कर्मचारी भी सहयोग करते हैं। गिरोह के सदस्यों के बारे में पूरी जानकारी हासिल करने के लिए एसटीएफ की टीम आरोपियों से पूछताछ की है। जो जानकारी मिली है उसका सत्यापन कराया जा रहा है। जल्द ही आरोपियों को रिमांड पर लिया जाएगा। ताकि गिरोह के अन्य सदस्यों व पूरे नेटवर्क के बारे में साक्ष्य जुटाए जा सकें।
