ढांचागत कमियां महिलाओं के नेतृत्व में सबसे बड़ी बाधा, लोहिया विधि विश्वविद्यालय का चौंकाने वाला शोध
लखनऊ, अमृत विचार: शिक्षा, योग्यता अथवा रुचि की बजाय महिलाओं के आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा व्यवस्थागत कमियां है। लखनऊ मंडल के उच्च शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के नेतृत्व पर किए गए एक महत्वपूर्ण शोध से यह बात सामने आई है कि महिलाओं की कम भागीदारी का कारण उनकी रुचि या योग्यता की कमी नहीं है। असली समस्या यह है कि संस्थानों में ऐसे रास्ते और व्यवस्थाएं मजबूत नहीं हैं, जो महिलाओं को शिक्षण और शैक्षणिक भागीदारी से आगे बढ़ाकर नेतृत्व पदों तक पहुंचा सकें। यह अध्ययन चैलेंजर तो वूमेन लीडरशिप इन हायर एजुकेशन ए पॉलिसी ओरिएंटेड स्टडी शीर्षक से तैयार किया गया है।
यह शोध डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के डॉ. शशांक शेखर द्वारा एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज, नई दिल्ली के सहयोग से किया गया।अध्ययन लखनऊ मंडल के विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़े 100 उत्तरदाताओं पर आधारित है। इसमें केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय, सरकारी महाविद्यालय, निजी महाविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों को शामिल किया गया। शोध में यह समझने की कोशिश की गई कि महिलाओं के नेतृत्व में आने की राह में कौन-कौन सी वास्तविक बाधाएं मौजूद हैं।
शोध के निष्कर्ष
शोध का एक बहुत महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि नेतृत्व की इच्छा की कमी नहीं है। सर्वेक्षण में 74 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि नेतृत्व या प्रशासनिक पदों पर जाना चाहते हैं। इसका मतलब है कि महिलाओं की कम उपस्थिति को सिर्फ इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि वे नेतृत्व में आना नहीं चाहतीं।
सर्वेक्षण में यह बातें आई सामने
42 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके संस्थान में महिलाएं वरिष्ठ नेतृत्व पदों पर हैं, लेकिन केवल 8 प्रतिशत ने माना कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत पर्याप्त है। दूसरी ओर, बड़ी संख्या में उत्तरदाताओं ने कहा कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व या तो बहुत कम है या लगभग नहीं के बराबर है। इससे साफ होता है कि कुछ महिलाओं का नेतृत्व पदों पर होना पर्याप्त नहीं है; ज़रूरी यह है कि उनकी संख्या और भूमिका दोनों प्रभावशाली हों।
औपचारिक और वास्तविक अवसर के अंतर
शोध में यह भी सामने आया कि औपचारिक अवसर और वास्तविक अवसर में अंतर है। 52 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि महिलाओं को नेतृत्व पदों के लिए समान अवसर व्यवहार में नहीं मिलते, जबकि केवल 31 प्रतिशत ने सहमति जताई। इसका अर्थ यह है कि नियमों में भले कोई सीधा भेदभाव न दिखे, लेकिन व्यवहार में अवसर कई बार अनौपचारिक नेटवर्क, चयन प्रक्रिया, प्रशासनिक और “कौन उपयुक्त है” जैसी धारणाओं से प्रभावित होते हैं।
प्रतिशत में आंकड़े
–63 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने वर्क लाइफ बैलेंस को जीवन को बड़ी समस्या बताया।
–58 प्रतिशत ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को माना
– 56 प्रतिशत ने सामाजिक धारणाओं को
–54 प्रतिशत ने उत्साह की कमी को
–52 प्रतिशत ने नेतृत्व प्रशिक्षण की कमी को
– 50 प्रतिशत ने संस्थागत सहयोग की कमी को
