राज्यसभा में बोले सभापति राधाकृष्णन- ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को सशक्त बनाना जरूरी

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नई दिल्ली। राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन ने बृहस्पतिवार को कहा कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को केवल समायोजित करने के बजाय उन्हें समाज के महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में पूर्ण रूप से सशक्त बनाया जाना चाहिए और यह एक साझा राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। संयुक्त राष्ट्र ने दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के तौर पर मनाने का ऐलान किया था। तब से हर साल दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 

राज्यसभा में अपने संबोधन में सभापति ने कहा कि संसद ऑटिज्म से प्रभावित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष का विषय "तंत्रिका विविधता को आगे बढ़ाना और सतत विकास लक्ष्य" यह रेखांकित करता है कि न्यूरोडायवर्सिटी को मानव विविधता का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए और विकास के प्रयास समावेशी तथा टिकाऊ होने चाहिए।

राधाकृष्णन ने कहा कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर संचार, व्यवहार और सामाजिक सहभागिता को प्रभावित करता है, लेकिन इससे जुड़े व्यक्तियों में विशिष्ट क्षमताएं और प्रतिभाएं भी होती हैं, जो उचित समर्थन और अवसर मिलने पर समाज को समृद्ध कर सकती हैं। उन्होंने भारत में मौजूद कानूनी ढांचे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 और राष्ट्रीय ट्रस्ट अधिनियम 1999 का उल्लेख करते हुए कहा कि ये अधिकारों की सुरक्षा और सहायता सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। 

सभापति ने चेतावनी दी कि कानून और योजनाएं तभी प्रभावी होती हैं जब उनके लाभ हर पात्र व्यक्ति तक पहुंचें। उन्होंने शुरुआती पहचान, समावेशी शिक्षा, कौशल विकास और सामुदायिक जागरूकता पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि एक समावेशी समाज तभी मजबूत होता है जब हर नागरिक को, उसकी क्षमताओं की परवाह किए बिना, योगदान देने और सफल होने का अवसर मिले। साथ ही उन्होंने सदस्यों से समझ, स्वीकृति और समान भागीदारी का वातावरण बनाने के लिए सामूहिक संकल्प दोहराने का आह्वान किया। 

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